एक बनाम चार में भारी पड़ा नांगल चौधरी : अभय के काफिले ने खींची सियासी लकीर | मंत्री-संगठन की ताकत भी नहीं बना सकी बड़ा फासला | तिरंगा यात्राओं ने खोल दिए राजनीति के पत्ते
महेंद्रगढ़ की सड़कों पर शुक्रवार को तिरंगा राष्ट्रभक्ति का संदेश लेकर निकला, लेकिन उसके पीछे चल रहे काफिलों ने सियासत को भी नया विषय दे दिया। एक तरफ पूर्व सिंचाई मंत्री अभय सिंह यादव थे, विधानसभा चुनाव की हार पीछे थी और साथ में केवल नांगल चौधरी विधानसभा की जमीन। दूसरी तरफ स्वास्थ्य मंत्री आरती सिंह राव थीं, चार विधानसभा क्षेत्रों से पहुंचे लोग, भाजपा की पूरी टीम और नारनौल विधायक ओमप्रकाश यादव के समर्थकों की ताकत। कागज पर मुकाबला एक और चार का था, लेकिन सड़क की तस्वीर ने राजनीतिक गणित को इतना आसान नहीं रहने दिया।

नांगल चौधरी में अभय सिंह यादव की यात्रा में सैकड़ों मोटरसाइकिलों का काफिला निकला। खास बात यह रही कि इसके लिए चार विधानसभा क्षेत्रों की ताकत नहीं लगाई गई थी। यात्रा में मुख्य रूप से नांगल चौधरी के लोग थे। पूर्व विधायक सीताराम यादव, वर्तमान विधायक कंवर सिंह यादव और पूर्व जिला अध्यक्ष राकेश शर्मा जैसे चेहरे भी अभय सिंह के साथ दिखाई दिए। चुनाव हारने के बाद आमतौर पर नेता के सामने सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि सत्ता और पद के बिना कितने लोग उसके साथ खड़े रहते हैं। शुक्रवार की तस्वीर ने कम से कम इतना जरूर दिखाया कि अभय सिंह यादव की राजनीतिक जमीन अभी खाली नहीं हुई है।

इसके उलट आरती सिंह राव की यात्रा का दायरा कहीं बड़ा था। यात्रा अटेली से शुरू होकर नारनौल पहुंची। इसमें चार विधानसभा क्षेत्रों से लोग शामिल हुए, भाजपा की टीम मैदान में थी और नारनौल विधायक ओमप्रकाश यादव के समर्थकों की मौजूदगी भी रही। राजनीतिक संसाधन और दायरा दोनों बड़े थे, इसलिए उम्मीद भी बड़े जनसैलाब की थी। लेकिन नांगल चौधरी की एक विधानसभा वाली यात्रा को सामने रखकर देखें तो चार विधानसभा की संयुक्त ताकत वैसा बड़ा फासला खड़ा करती दिखाई नहीं दी, जिसकी राजनीतिक तौर पर उम्मीद की जा रही थी।

यहीं से सियासत का असली सवाल शुरू होता है। विधानसभा स्तर पर यात्राएं निकाली जा रही थीं और नारनौल विधायक ओमप्रकाश यादव अपने क्षेत्र में पहले ही तिरंगा यात्रा निकाल चुके थे। इसके बाद अटेली से चली यात्रा का नारनौल तक पहुंचना अपने आप में बड़े राजनीतिक प्रदर्शन की तस्वीर बना रहा था। अटेली की जनता, नारनौल के विधायक समर्थक और दूसरे क्षेत्रों से आए कार्यकर्ता—इतना बड़ा कैनवास तैयार होने के बाद मुकाबला केवल अटेली और नांगल चौधरी का नहीं रहा। पैमाना खुद-ब-खुद बड़ा हो गया।

नांगल चौधरी में कहानी इससे उलट थी। वहां अभय सिंह यादव के पास मंत्री की कुर्सी नहीं थी, मौजूदा विधायक का पद नहीं था और चार विधानसभा क्षेत्रों का संयुक्त जमावड़ा भी नहीं था। इसके बावजूद सैकड़ों मोटरसाइकिलों के साथ निकली यात्रा ने वह तस्वीर खड़ी कर दी जिसने चार विधानसभा वाली यात्रा को तुलना के दायरे में ला दिया। राजनीति में कई बार जीत भीड़ की गिनती से नहीं, उम्मीद और प्रदर्शन के बीच के अंतर से तय होती है। शुक्रवार को यही अंतर सबसे ज्यादा बोलता दिखाई दिया।

अभय सिंह यादव ने यात्रा के दौरान अपने पुराने बेबाक अंदाज को भी नहीं छोड़ा। चुनावी हार के बाद रक्षात्मक होने के बजाय उन्होंने विरोधियों पर जमकर पलटवार किया। राव तुलाराम के नाम पर राजनीति को लेकर उनका कटाक्ष भी साफ था—राव तुलाराम के कंधे से उतरकर अपनी राजनीति करने की हिम्मत दिखाइए। एक तरफ सड़क पर समर्थकों का काफिला और दूसरी तरफ मंच से विरोधियों पर हमला, अभय सिंह ने यात्रा को केवल तिरंगा लेकर निकलने तक सीमित नहीं रहने दिया।

दयाराम यादव की तस्वीर ने राजनीतिक चर्चा में एक और परत जोड़ दी। तिरंगा यात्रा अभियान में संयोजक की भूमिका होने के बावजूद वह नांगल चौधरी की यात्रा में नजर नहीं आए, लेकिन आरती सिंह राव की यात्रा में सबसे आगे दिखाई दिए। इसका राजनीतिक अर्थ क्या है, यह संबंधित नेता ही बता सकते हैं, मगर राजनीति में अनुपस्थिति भी उतनी ही चर्चा पैदा करती है जितनी उपस्थिति। खासकर तब, जब कुछ घंटों के भीतर एक जगह खाली कुर्सी और दूसरी जगह अगली कतार दिखाई दे।
इस शक्ति प्रदर्शन की पृष्ठभूमि भी नई नहीं है। राव तुलाराम मेडिकल कॉलेज में प्रधानमंत्री के कार्यक्रम के बाद से क्षेत्र की राजनीति में प्रभाव और नेतृत्व को लेकर जो चर्चाएं चलीं, शुक्रवार की यात्राओं ने उन्हें फिर हवा दे दी। उस कार्यक्रम के बाद यदि राजनीतिक ताकत को लेकर पटकथा लिखी गई थी, तो तिरंगा यात्राओं ने सड़क पर उसका एक नया दृश्य जरूर दिखा दिया।
यहां यह स्पष्ट रहना चाहिए कि तिरंगा किसी राजनीतिक मुकाबले का हिस्सा नहीं है। राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान दोनों यात्राओं का मूल उद्देश्य था। राजनीतिक चर्चा तिरंगे की नहीं, उसके पीछे दिखाई दिए नेताओं, संगठन, क्षेत्रीय भागीदारी और जनसमर्थन की है। दोनों यात्राओं की भीड़ का कोई प्रमाणित आधिकारिक आंकड़ा भी सामने नहीं है, इसलिए संख्या को अंतिम फैसला नहीं बनाया जा सकता।
लेकिन राजनीति में हर सवाल का जवाब सरकारी आंकड़ों में नहीं मिलता, कुछ जवाब तस्वीरें भी देती हैं। शुक्रवार की तस्वीर में एक तरफ चार विधानसभा क्षेत्रों की संयुक्त राजनीतिक मशीनरी थी और दूसरी तरफ अकेला नांगल चौधरी। एक तरफ सत्ता और मंत्री पद था, दूसरी तरफ चुनावी हार के बाद मैदान में खड़ा पूर्व मंत्री। फिर भी यदि शाम होते-होते चर्चा इस बात की हो कि एक विधानसभा चार विधानसभा के सामने कम नहीं दिखी, तो अभय सिंह यादव के लिए शायद इससे बड़ा राजनीतिक संदेश किसी संख्या में नहीं लिखा जा सकता।
Editor: State Desk



