बिना चालू स्टेशन का भुगतान कैसे : 2022 में बनकर तैयार | धरातल पर मिला बंद | बोरवेल से चल रही सप्लाई
नारनौल विधानसभा क्षेत्र के गांव धरसु में करोड़ों रुपये खर्च कर तैयार किए गए बूस्टिंग स्टेशन को लेकर सबसे बड़ा सवाल इसके फाइनल बिल और भुगतान पर खड़ा हो गया है। ग्रामीणों का आरोप है कि वर्ष 2022 में बनकर तैयार हुए बूस्टिंग स्टेशन को आज तक नियमित रूप से चालू नहीं किया गया, जबकि निर्माण कार्य की पूरी पेमेंट कर दी गई। ऐसे में सवाल सीधा है कि जिस परियोजना का लाभ धरातल पर ग्रामीणों को मिला ही नहीं, उसका फाइनल बिल किस आधार पर पास किया गया और भुगतान से पहले स्टेशन को चालू हालत में किसने प्रमाणित किया?
ग्राउंड ज़ीरो न्यूज़ की टीम ने मौके पर पहुंचकर स्थिति देखी तो ग्रामीणों के आरोपों को लेकर कई सवाल खड़े हुए। बूस्टिंग स्टेशन के गेट पर ताला लटका हुआ था और मौके पर कोई कर्मचारी मौजूद नहीं मिला। वहीं स्टेशन के पास सरकारी बोरवेल चलता हुआ मिला। ग्रामीणों के मुताबिक गांव में पानी की सप्लाई आज भी इसी तरह बोरवेल के माध्यम से की जा रही है। यानी जिस बूस्टिंग स्टेशन पर सरकार की ओर से बड़ी राशि खर्च की गई, वह मौके पर बंद मिला और पुरानी व्यवस्था के सहारे ही गांव को पानी दिया जा रहा था।

प्राप्त जानकारी के अनुसार धरसु में बूस्टिंग स्टेशन बनाने का काम वर्ष 2021 में शुरू हुआ था। इसका निर्माण देवेंद्र कुमार कॉन्ट्रेक्टर द्वारा किया गया और वर्ष 2022 में निर्माण कार्य पूरा हो गया। इसके बाद निर्माण कार्य का फाइनल भुगतान किए जाने की बात सामने आई है। यहीं से पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण सवाल शुरू होता है।
ग्रामीणों का कहना है कि संबंधित एग्रीमेंट में स्टेशन को चालू करने के बाद भुगतान का प्रावधान था। यदि एग्रीमेंट में वास्तव में यह शर्त दर्ज है तो बिना बूस्टिंग स्टेशन को नियमित रूप से चालू किए फाइनल बिल कैसे पास हुआ? भुगतान जारी करने से पहले क्या स्टेशन का ट्रायल किया गया था? क्या गांव में बूस्टिंग स्टेशन से पानी की सप्लाई शुरू कर इसकी जांच की गई थी? किस अधिकारी ने काम पूरा होने की रिपोर्ट दी और किसके प्रमाणपत्र के आधार पर अंतिम भुगतान जारी किया गया? इन सवालों का जवाब संबंधित विभाग के रिकॉर्ड और मूल एग्रीमेंट की जांच से ही सामने आ सकता है।

मामला केवल यह नहीं है कि स्टेशन आज बंद मिला। असली सवाल यह है कि सरकारी धन का फाइनल भुगतान उस समय किन शर्तों और किस तकनीकी सत्यापन के आधार पर किया गया था। यदि भुगतान से पहले स्टेशन को चालू करना अनुबंध की शर्त थी तो विभाग को यह स्पष्ट करना होगा कि उस शर्त का पालन हुआ या नहीं। यदि स्टेशन उस समय चालू किया गया था तो उसका ट्रायल, कमीशनिंग, पानी की सप्लाई और हैंडओवर से संबंधित रिकॉर्ड कहां है। और यदि स्टेशन चालू नहीं हुआ था तो फाइनल भुगतान जारी करने का आधार क्या था।
ग्रामीणों का कहना है कि करीब चार साल से बूस्टिंग स्टेशन बनकर खड़ा है, लेकिन गांव की निर्भरता आज भी बोरवेल पर बनी हुई है। एक ग्रामीण ने बताया कि गांव में पानी की सप्लाई बोरवेल से होती है और उसने बूस्टिंग स्टेशन को चलते हुए नहीं देखा। ग्रामीणों का कहना है कि जब बूस्टिंग स्टेशन पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए तो उसका उद्देश्य गांव को बेहतर जलापूर्ति उपलब्ध कराना था। यदि चार साल बाद भी वही पुरानी बोरवेल व्यवस्था चल रही है तो परियोजना पर हुए खर्च और भुगतान की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
ग्राउंड ज़ीरो न्यूज़ की टीम के निरीक्षण के दौरान बूस्टिंग स्टेशन बंद मिला। स्थानीय लोगों की मौजूदगी में संबंधित कर्मचारियों से फोन पर संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया। सरपंच से फोन पर बात हुई तो उन्होंने बताया कि वह बैठक में हैं और बाद में बात करेंगे। इसलिए मौके पर स्टेशन बंद होने को लेकर तत्काल कोई विस्तृत स्पष्टीकरण नहीं मिल सका।
ग्रामीण सतपाल का कहना है कि पेयजल समस्या को लेकर वह सीएम विंडो पर भी शिकायत कर चुके हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि कई बार शिकायत करने के बावजूद बूस्टिंग स्टेशन से नियमित जलापूर्ति शुरू नहीं हो सकी। ऐसे में ग्रामीण अब केवल स्टेशन चालू करने की मांग ही नहीं कर रहे, बल्कि यह भी जानना चाहते हैं कि इसका फाइनल भुगतान किन परिस्थितियों में किया गया।
वर्ष 2025 में स्टेशन पर जय भारत कंस्ट्रक्शन द्वारा ऑटोमैटिक क्लोरीनेशन सिस्टम लगाए जाने की जानकारी भी सामने आई है। इसकी अनुमानित कीमत लाखों रुपये बताई जा रही है। हालांकि वास्तविक राशि की पुष्टि विभागीय रिकॉर्ड से होना बाकी है। यह सिस्टम पेयजल में नियंत्रित मात्रा में क्लोरीन मिलाकर उसे कीटाणुरहित करने की प्रक्रिया का हिस्सा होता है। लेकिन धरसु के मामले में मुख्य प्रश्न फिर वही है कि जिस बूस्टिंग स्टेशन से नियमित सप्लाई शुरू होने पर ही ऐसी व्यवस्था का पूरा उपयोग होना है, उस स्टेशन की वास्तविक संचालन स्थिति क्या रही है।
पब्लिक हेल्थ विभाग के एक्सईएन प्रदीप यादव से इस संबंध में बात की गई तो उन्होंने बताया कि वह फिलहाल बाहर हैं और मामले की जानकारी जुटाने के बाद ही कुछ बता पाएंगे। वहीं विभाग के एसई एसपी जोशी ने मामले की जांच करवाने की बात कही। उन्होंने कहा कि वह इस संबंध में एक्सईएन को बोलकर जानकारी लेंगे।
अब विभाग को मुख्य रूप से यह स्पष्ट करना होगा कि देवेंद्र कुमार कॉन्ट्रेक्टर द्वारा किए गए निर्माण कार्य का फाइनल बिल किस तारीख को और कितनी राशि का पास किया गया, भुगतान से पहले स्टेशन के चालू होने की पुष्टि किस अधिकारी ने की, ट्रायल और कमीशनिंग रिपोर्ट कहां है और कार्य पूर्णता प्रमाणपत्र किस आधार पर जारी किया गया। यदि स्टेशन के चालू होने के बाद ही फाइनल भुगतान की शर्त एग्रीमेंट में दर्ज है तो उस शर्त के अनुपालन से जुड़े दस्तावेज भी सामने आने चाहिए।
ग्राउंड ज़ीरो न्यूज़ की मौके की पड़ताल में फिलहाल स्थिति स्पष्ट थी—बूस्टिंग स्टेशन पर ताला था और पास में सरकारी बोरवेल चल रहा था। इसलिए अब सवाल निर्माण होने या मशीनें लगने भर का नहीं, बल्कि भुगतान की जवाबदेही का है। जब धरातल पर ग्रामीण आज भी बोरवेल से पानी लेने को मजबूर हैं तो करोड़ों रुपये की परियोजना का फाइनल बिल किस आधार पर पास हुआ, इसका स्पष्ट और दस्तावेजी जवाब संबंधित विभाग को देना होगा।
Editor: शिवानी राजपूत



