Yamunanagar News | डॉ. भल्ला की नई पुस्तक का विमोचन : ‘मंज़िल की कशिश : राहों की कसक’ पाठकों के बीच | वरुण गुलाटी ने किया विमोचन

गुरु नानक खालसा कॉलेज, यमुनानगर के प्राचार्य एवं साहित्यकार डॉ. अरविंदर सिंह भल्ला की नवीनतम पुस्तक ‘मंज़िल की कशिश : राहों की कसक’ का विमोचन नई दिल्ली में किया गया। भारतीय साहित्य अकादमी के सचिव वरुण गुलाटी ने अपने कार्यालय में पुस्तक का विमोचन करते हुए डॉ. भल्ला की साहित्यिक यात्रा और उनके लेखन में मौजूद विषय-विविधता की सराहना की।
डॉ. अरविंदर सिंह भल्ला लंबे समय से शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार पंजाबी और अंग्रेजी भाषा में उनकी अब तक 25 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनके लेखन में शिक्षा, सिख धर्म एवं दर्शन और पंजाबी गद्य सहित विभिन्न विषयों को स्थान मिला है।
पुस्तक का विमोचन करते हुए वरुण गुलाटी ने कहा कि डॉ. भल्ला की लेखकीय यात्रा में निरंतरता के साथ विषयों की विविधता और चिंतन की गहराई दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि ‘मंज़िल की कशिश : राहों की कसक’ में लेखक ने जीवन, समाज और मानवीय अनुभवों को अपनी दृष्टि से प्रस्तुत किया है।
उन्होंने कहा कि डॉ. भल्ला की लेखनी में अनुभव की परिपक्वता और विचारों की सहजता का समन्वय देखने को मिलता है। वरुण गुलाटी ने नई कृति के प्रकाशन पर उन्हें बधाई देते हुए उम्मीद जताई कि यह पुस्तक पाठकों के साथ सार्थक संवाद स्थापित करेगी।
डॉ. अरविंदर सिंह भल्ला ने अपनी लेखन यात्रा के बारे में कहा कि उनके लिए लेखन जीवन को देखने, समझने और अनुभवों को शब्द देने की एक प्रक्रिया है। उनका प्रयास रहता है कि उनकी रचना पाठक को केवल पढ़ने तक सीमित न रखे, बल्कि उसे अपने अनुभवों पर विचार करने और जीवन को नए दृष्टिकोण से देखने के लिए प्रेरित करे।
पुस्तक के शीर्षक ‘मंज़िल की कशिश : राहों की कसक’ के भाव को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि मंजिल की चाह मनुष्य को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है, लेकिन मंजिल तक पहुंचने के दौरान रास्ते में मिलने वाले अनुभव, संघर्ष, ठहराव और संबंध भी व्यक्ति के जीवन और व्यक्तित्व को आकार देते हैं।
डॉ. भल्ला के अनुसार जीवन की सार्थकता केवल लक्ष्य हासिल करने में नहीं होती, बल्कि लक्ष्य तक पहुंचने की यात्रा से मिलने वाली समझ और अनुभव भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। इसी भाव को उन्होंने अपनी नई पुस्तक में अलग-अलग मानवीय अनुभवों और संवेदनाओं के माध्यम से सामने रखने का प्रयास किया है।
उन्होंने कहा कि किसी पुस्तक का वास्तविक सफर उसके प्रकाशित होने के बाद शुरू होता है। जब पुस्तक पाठकों तक पहुंचती है तो उसमें व्यक्त विचार पाठकों के अपने अनुभवों और संवेदनाओं से जुड़ते हैं। यही संवाद किसी साहित्यिक कृति को व्यापक अर्थ प्रदान करता है।
डॉ. भल्ला ने पुस्तक का विमोचन करने के लिए वरुण गुलाटी का आभार व्यक्त किया। उन्होंने इस अवसर को अपनी साहित्यिक यात्रा के लिए विशेष और प्रसन्नता का विषय बताया। नई पुस्तक को उनकी साहित्यिक यात्रा की एक और कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।
लेखन के साथ डॉ. भल्ला शोध और अकादमिक गतिविधियों में भी सक्रिय हैं। उपलब्ध विवरण के मुताबिक उन्होंने दो सरकारी अनुदान प्राप्त शोध परियोजनाएं पूरी की हैं और वर्तमान में दो अन्य शोध परियोजनाओं पर कार्य कर रहे हैं।
उनके अब तक 80 से अधिक शोध-पत्र और 150 से अधिक लेख प्रकाशित होने की जानकारी दी गई है। साहित्य के साथ शोध एवं अकादमिक लेखन में उनकी सक्रियता शिक्षा और ज्ञान-सृजन के क्षेत्र में उनके कार्य को विस्तार देती है।
गुरु नानक खालसा कॉलेज के प्राचार्य के रूप में प्रशासनिक जिम्मेदारियों के साथ साहित्य, शोध और अकादमिक लेखन में उनकी निरंतर सक्रियता रही है। ‘मंज़िल की कशिश : राहों की कसक’ के प्रकाशन के साथ उनकी साहित्यिक यात्रा में एक और पुस्तक जुड़ गई है।



