नरवीर प्रकरण से गरमाई राजनीति: राव की ताकत या कमज़ोरी ?, अहीरवाल में बढ़ी राजनीतिक चर्चा, नेतृत्व और वर्चस्व पर उठे सवाल

रिपोर्टर: हरविन्द्र यादव
| हरियाणा

राव की ताकत या राजनीतिक असुरक्षा ?

हाल ही में जिला कष्ट निवारण समितियों के लिए सरकार द्वारा विभिन्न मंत्रियों के बीच ज़िलों के बंटवारे के मामले में उद्योग मंत्री राव नरवीर सिंह को पहले रेवाड़ी दिया गया परंतु उसके तुरंत बाद ही इसे बदलकर झज्जर कर दिया गया। राजनीतिक क्षेत्रों में यह चर्चा का विषय है और राव समर्थक इसे राव इंद्रजीत सिंह की भाजपा पर पकड़ और ताकत के रूप में पेश कर रहे हैं। प्रथम दृष्टि से ऐसा प्रतीत भी हो रहा है कि भारतीय जनता पार्टी अब पूरी तरह राव के कब्ज़े में है और अहीरवाल में राव की मर्ज़ी के बिना कोई भी फैसला पार्टी नहीं ले सकती।

भाजपा में किसकी चल रही मर्ज़ी ?

चाहे मानेसर नगर निगम से पार्टी के खिलाफ जीती हुई मेयर इंद्रजीत कौर को पार्टी में शामिल करना हो या रेवाड़ी और धारूहेड़ा नगर पालिकाओं में पार्टी की टिकट वितरण की बात हो या फिर अब नरवीर सिंह का जिला बदलने की बात हो, ये सभी घटनाएँ इस बात के प्रमाण हैं कि भारतीय जनता पार्टी अहीरवाल में राव की इच्छा के खिलाफ चलने की स्थिति में नहीं है। वैसे भी यह बात किसी से छुपी नहीं है क्योंकि स्वयं राव भी अपने अंदाज़ में पब्लिक को इस बात का एहसास समय-समय पर करवाते रहते हैं, जिसका एक ताज़ा उदाहरण मुख्यमंत्री की स्टेज से राव के भाषण का अंदाज़ था।

विकास पीछे या राजनीति आगे ?

विशेष बात यह है कि राव की लंबी राजनीति और इस अंदाज़ की चर्चा तो होती रहती है परंतु कभी भी इसके परिणाम पर चर्चा नहीं होती। मूल प्रश्न यह है कि राव के इस अंदाज़ से आम आदमी को क्या मिला। यदि इसको गहराई से देखें तो इसमें सकारात्मक से ज़्यादा नकारात्मकता नज़र आती है। यह कटु विडंबना है कि अहीर समाज के निर्विवाद नेता होते हुए भी राव की इस राजनीति का शिकार भी अहीर समाज ही हुआ है।

उभरते चेहरों से क्यों असहज दिखती राजनीति ?

इसका मूल कारण यह है कि लंबे समय तक सत्ता के शीर्ष पर रहते हुए राव ने अपनी सहन शक्ति को अपने अहंकार की भेंट चढ़ा दिया है। इस शक्ति की पराकाष्ठा यह है कि उनकी इच्छा के विरुद्ध अहीरवाल में कोई भी उभरता हुआ नेतृत्व उनकी बर्दाश्त से बाहर है। इसका प्रदर्शन वह यथा समय करते रहे हैं चाहे वह टिकट वितरण हो या मंत्रिमंडल में स्थान। यद्यपि कांग्रेस में रहते हुए राव को इतना वर्चस्व कभी भी नहीं मिला। परंतु भाजपा ने चाहे अनचाहे उन्हें पूरा अहीरवाल सौंप दिया है।

नेता मजबूर या नतमस्तक ?

और वास्तविकता यह है कि अब इक्के-दुक्के चुनिंदा नेताओं को छोड़कर पक्ष-विपक्ष के सभी नेता राव के समक्ष नतमस्तक हैं। इस प्रक्रिया में क्षेत्र का विकास पीछे छूट रहा है और यह स्पष्ट राजनीतिक संदेश स्थापित हो चुका है कि अहीरवाल की राजनीति में ज़िंदा रहने के लिए किसी भी नेता को विकास और उपलब्धि की बजाय राव को प्रसन्न रखने की चिंता करनी होगी।

ताकत का प्रदर्शन या अंदरूनी डर ?

परंतु इस समस्त राजनीतिक घटनाक्रम को यदि गहराई से देखें तो कहीं न कहीं इसकी पृष्ठभूमि में स्वयं राव के आत्मविश्वास में कमी व उनकी स्वयं की राजनीतिक असुरक्षा नज़र आती है। उदाहरण के रूप में यदि राव-नरवीर के ताज़ा प्रकरण को ही देखें तो क्या यदि राव नरवीर सिंह महीने में एक बार रेवाड़ी शिकायत निवारण कमेटी की मीटिंग ले भी लेते तो क्या राव इंद्रजीत सिंह की राजनीति इतनी कमज़ोर है कि इतने में ही उनकी राजनीति को खतरा हो जाता। नहीं, ऐसा हरगिज़ नहीं है।

राव बनाम उभरता नेतृत्व : क्या यही है असली संघर्ष ?

वास्तविकता यह है कि उन्हें अहीर नेतृत्व ही पसंद नहीं है। वह अपने और अपने परिवार के अलावा किसी भी उभरने वाले अहीर नेतृत्व को सहन ही नहीं कर सकते। इस प्रक्रिया में उनके लिए कोई अपवाद नहीं है। जिन नेताओं को वह पहली बार टिकट दिलाते हैं और जिताते हैं, दूसरी बार उनको आगे बढ़ाने में भी उनको दिक्कत होती है। अतः उनके अपने कहे जाने वाले भी इस प्रक्रिया से अछूते नहीं हैं। इसके विपरीत अहीर समाज से बाहर से बनने वाले सांसद और विधायक हमेशा उनके प्रिय रहे हैं क्योंकि उनसे वह अपनी राजनीति को कोई चुनौती नहीं मानते। चाहे आप इसे राव की राजनीतिक मजबूरी कहें या कमज़ोरी, पर सत्य तो यही है।

Edit By: न्यूज डेस्क
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