नारनौल। नगर परिषद नारनौल टेंडर का खेला : सरकारी खजाने पर डाका | 89 लाख की सड़क में 7 में से 5 फर्में बाहर | दो फर्म के टेंडर खोले और दोनों एक ही व्यक्ति की
नारनौल। नगर परिषद नारनौल में अधिकारियों के बदलते ही अब पुराने कार्यों और टेंडर प्रक्रियाओं की परतें खुलनी शुरू हो गई हैं। अक्टूबर 2025 में सिंघाना रोड से नंदी गौशाला तक करीब 89 लाख रुपये की लागत से बनने वाली सड़क का मामला अब गंभीर सवालों के घेरे में आ गया है। टेंडर प्रक्रिया से […]

नारनौल। नगर परिषद नारनौल में अधिकारियों के बदलते ही अब पुराने कार्यों और टेंडर प्रक्रियाओं की परतें खुलनी शुरू हो गई हैं। अक्टूबर 2025 में सिंघाना रोड से नंदी गौशाला तक करीब 89 लाख रुपये की लागत से बनने वाली सड़क का मामला अब गंभीर सवालों के घेरे में आ गया है। टेंडर प्रक्रिया से लेकर कार्य की गुणवत्ता और भुगतान तक हर स्तर पर अनियमितताओं की आशंका जताई जा रही है।
जानकारी के अनुसार इस कार्य के लिए कुल सात फर्मों ने टेंडर लगाए थे, जिनमें दी भिवानी अमर नगर कोऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड, दी भिवानी सिद्धिविनायक कोऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड, द ग्रेट हरियाणा कोऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड नारनौल, दी ग्रो मोर कोऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड, दी हिसार महावीर कॉलोनी कोऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड, नीमडीवाली कोऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड तथा दी शिकारपुर आदर्श कोऑपरेटिव सोसाइटी हिसार और दी श्री राम कोऑपरेटिव लेबर एंड कंस्ट्रक्शन सोसाइटी लिमिटेड शामिल थीं।
आरोप है कि नगर परिषद के अधिकारियों ने इनमें से पांच फर्मों को विभिन्न कारणों का हवाला देकर रिजेक्ट कर दिया और केवल दो फर्मों के टेंडर ही खोले गए। सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकारी नियमों के अनुसार किसी कार्य के पहले टेंडर में प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने के लिए कम से कम तीन फर्मों की भागीदारी आवश्यक मानी जाती है, लेकिन यहां मात्र दो फर्मों के टेंडर खोले गए। और हैरानी की बात यह बताई जा रही है कि दोनों फर्मों का संबंध एक ही व्यक्ति से था।
जो फर्में पहले से काम कर रही थीं, वही अचानक अयोग्य कैसे हो गईं?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल उन पांच फर्मों को लेकर उठ रहा है जिन्हें टेंडर प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया। इनमें से कई फर्में पहले से नारनौल क्षेत्र में विभिन्न सरकारी कार्य कर रही थीं और उनकी पात्रता पर कभी सवाल नहीं उठे। फिर आखिर इस विशेष कार्य में ऐसी कौन सी कमी सामने आ गई कि उन्हें सीधे रिजेक्ट कर दिया गया?
क्या इन फर्मों को जानबूझकर बाहर का रास्ता दिखाया गया? क्या किसी विशेष ठेकेदार को लाभ पहुंचाने के लिए टेंडर प्रक्रिया को प्रभावित किया गया? यदि नहीं, तो नगर परिषद को रिजेक्शन के पूरे रिकॉर्ड और कारण सार्वजनिक करने चाहिए।
सनसनी खेज बात टेंडर लगे अक्टूबर 2025 में खोले गए फरवरी 2026 में
यूएलबी विभाग की टेंडर साईट पर टेंडर प्रक्रिया पूरी करने का रिकॉर्ड बड़ा सनसनीखेज दिख रहा है। साइट से जो प्रमाण मिले हैं, बे भी बड़े चौंकाने वाले हैं। सात फर्मो ने टेंडर अंतिम तिथि 17 अक्टूबर 2025 को लगाए थे और यह टेंडर ओपन चार महीने बाद 17 फरवरी 2026 फरवरी को किए गए, वो भी पांच फार्मो को रिजेक्ट करने के बाद। यहां नियम यह भी है कि किसी फर्म को रिजेक्ट करने से पहले उसको नोटिस दिए जाते हैं।
टेंडर प्रक्रिया पहले सवालों में, फिर निर्माण कार्य भी घेरे में
मामला केवल टेंडर तक सीमित नहीं है। आरोप है कि जिस सड़क का निर्माण किया गया, उसमें भी भारी अनियमितताएं बरती गईं। परियोजना में शामिल बताए जा रहे टो वॉल ( सड़क के दोनों तरफ ईंटों का काम) के निशान तक मौके पर दिखाई नहीं देते। यदि टेंडर की शर्तों में यह कार्य शामिल था तो यह काम ना होने पर भी उसका भुगतान किस आधार पर किया गया?
सरकार के नियमों के अनुसार नगर परिषद में किसी भी विकास कार्य का भुगतान तकनीकी निरीक्षण और मॉनिटरिंग के बाद किया जाता है। लेकिन जब टेंडर प्रक्रिया ही विवादों में रही, तो सवाल उठता है कि निर्माण कार्य की गुणवत्ता की निगरानी किसने की? क्या अधिकारियों ने मौके का निरीक्षण किया था? यदि किया था तो कमियों के बावजूद भुगतान क्यों जारी किया गया?
जनता पूछ रही है—जवाब कौन देगा?
सात में से पांच फर्मों को आखिर किस आधार पर रिजेक्ट किया गया?
क्या रिजेक्ट की गई फर्मों को सुनवाई का अवसर दिया गया?
क्या दोनों बची हुई फर्मों का संबंध एक ही व्यक्ति से था?
यदि हां, तो ऐसी स्थिति में टेंडर प्रक्रिया आगे कैसे बढ़ाई गई?
टेंडर में शामिल टो वॉल कहां है? कार्य की तकनीकी जांच किस अधिकारी ने की?
गुणवत्ता की पुष्टि किस आधार पर की गई? लाखों रुपये का भुगतान किन रिपोर्टों के आधार पर जारी हुआ?
क्या इस पूरे मामले की
विजिलेंस, लोकायुक्त या उच्च स्तरीय जांच की मांग
नगर परिषद के इस कथित टेंडर खेल ने शहर में विकास कार्यों की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि आरोपों में सच्चाई है तो यह केवल एक सड़क का मामला नहीं बल्कि सरकारी धन के उपयोग, टेंडर प्रणाली की निष्पक्षता और अधिकारियों की जवाबदेही का मामला है। जनता अब मांग कर रही है कि पूरे प्रकरण की स्वतंत्र तकनीकी और वित्तीय जांच कराई जाए ताकि सच सामने आ सके और दोषियों पर कार्रवाई हो सके।



