नारनौल | ग्राउंड जीरो न्यूज़ का बड़ा खुलासा : पब्लिक हेल्थ विभाग में एलओसी घोटाले की जांच तेज | चीफ इंजीनियर शुक्रवार को करेंगे रिकॉर्ड की पड़ताल

रिपोर्टर: रामचन्द्र सैनी
| नारनौल
जनस्वास्थ्य विभाग में फर्जी टोकनों और बिलों के आरोपों से जुड़ा शिकायत पत्र आया सामने।
जनस्वास्थ्य विभाग में फर्जी टोकनों और बिलों के आरोपों से जुड़ा शिकायत पत्र आया सामने।

नारनौल के जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (पब्लिक हेल्थ) डिवीजन नंबर-1 में फर्जी टोकनों और फर्जी बिलों के जरिए एलओसी (लेटर ऑफ क्रेडिट) की कथित बंदरबांट का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। विभाग में लंबे समय से चल रहे इस कथित खेल को लेकर उठे सवालों के बाद अब मुख्यालय भी हरकत में आ गया है। ग्राउंड जीरो द्वारा मामला प्रमुखता से उजागर किए जाने के बाद विभागीय स्तर पर हड़कंप मच गया है और जांच के आदेश जारी कर दिए गए हैं।

सूत्रों के अनुसार विभाग के चीफ इंजीनियर जसवंत सिंह शुक्रवार 8 मई को नारनौल पहुंचेंगे। बताया जा रहा है कि वह दोपहर करीब 3 बजे नसीबपुर स्थित एसई कार्यालय में संबंधित अधिकारियों के साथ बैठक करेंगे और पूरे मामले से जुड़े रिकॉर्ड, टोकन, बिल और भुगतान फाइलों की जांच करेंगे। जांच प्रक्रिया में शिकायतकर्ता को भी शामिल किया जाएगा ताकि दस्तावेजों और आरोपों की आमने-सामने पड़ताल हो सके।

करोड़ों के भुगतान और फर्जी टोकनों के आरोपों वाला पत्र बना जांच का आधार।

करोड़ों के भुगतान और फर्जी टोकनों के आरोपों वाला पत्र बना जांच का आधार।

टोकन सिस्टम बना खेल का सबसे बड़ा हथियार

जानकारी के अनुसार पब्लिक हेल्थ विभाग में टोकन के आधार पर ही एलओसी की मांग मुख्यालय को भेजी जाती है। सरकार से जितनी एलओसी प्राप्त होती है, उसी अनुपात में ठेकेदारों के बिलों का भुगतान किया जाता है। आरोप है कि इसी प्रक्रिया का दुरुपयोग करते हुए विभाग में फर्जी टोकन तैयार कर एलओसी की डिमांड कृत्रिम रूप से बढ़ाई जाती रही।

सूत्रों का दावा है कि कर्मचारियों और कुछ अधिकारियों की मिलीभगत से ऐसे टोकन बनाए गए जिनका जमीनी कार्यों से कोई वास्तविक संबंध नहीं था। इन टोकनों के आधार पर चहेते ठेकेदारों के बिलों का भुगतान प्राथमिकता से जारी किया जाता रहा, जबकि अन्य ठेकेदार अपने भुगतान के लिए महीनों तक चक्कर काटते रहे।

मामले में सबसे गंभीर आरोप यह है कि जिन कार्यों के नाम पर टोकन जारी किए गए, उनमें से कई काम मौके पर दिखाई ही नहीं देते। बावजूद इसके कागजों में उन्हें पूरा दर्शाकर सरकारी खजाने से भुगतान निकाल लिया गया।

सूत्रों का कहना है कि विभाग के अंदर लंबे समय से यह “टोकन सिंडिकेट” सक्रिय था, लेकिन अब तक किसी अधिकारी ने खुलकर कार्रवाई नहीं की। कई कर्मचारियों पर आरोप है कि उन्होंने नियमों को ताक पर रखकर फर्जी दस्तावेजों के जरिए भुगतान प्रक्रिया को प्रभावित किया।

शिकायत में सामने आए थे बिलों के सीरियल नंबर

मामले को लेकर दी गई लिखित शिकायत में स्पष्ट तौर पर आरोप लगाया गया था कि 23 अगस्त 2025 को 48939 से 49057 सीरियल तक बनाए गए बिल कथित रूप से फर्जी टोकनों को दर्शाने के लिए तैयार किए गए थे। शिकायतकर्ता के अनुसार उस समय तत्कालीन कार्यकारी अभियंता आदर्श कुमार सिंगला ने मामले को गंभीर मानते हुए उच्च अधिकारियों को पत्राचार भी किया था।

हालांकि कुछ समय बाद उनके तबादले के चलते पूरा मामला ठंडे बस्ते में चला गया और जांच आगे नहीं बढ़ सकी।

इसके बाद 26 फरवरी 2026 को वर्तमान कार्यकारी अभियंता जितेंद्र कुमार ने शिकायतकर्ताओं के साथ बैठक कर जांच के बिंदु तय किए थे। उस दौरान संबंधित अधिकारियों से उक्त सीरियल के बिल पेश करने को कहा गया था, लेकिन अब तक इस दिशा में कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया।

अब उठ रहे बड़े सवाल

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या विभाग के उच्च अधिकारी इस पूरे खेल से अनजान थे या फिर उनकी जानकारी में ही यह सब चलता रहा? यदि जांच निष्पक्ष और गहराई से हुई तो विभाग में बड़े स्तर पर वित्तीय अनियमितताओं और फर्जी भुगतान के नेटवर्क का खुलासा हो सकता है।

ग्राउंड जीरो द्वारा मामला उजागर होने के बाद विभाग में बेचैनी बढ़ गई है। शुक्रवार को होने वाली जांच को लेकर अधिकारियों और कर्मचारियों में हलचल तेज है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जांच के बाद आखिर किन अधिकारियों और कर्मचारियों पर कार्रवाई की गाज गिरती है।

Edit By: शिवानी राजपूत
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