नारनौल | महर्षि च्यवन मेडिकल कॉलेज में हॉस्टल में घुसा युवक: कॉलेज प्रशासन बना धृतराष्ट्र, सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह फेल

रामचन्द्र सैनी
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महेंद्रगढ़ (नारनौल )

महर्षि च्यवन मेडिकल कॉलेज में हॉस्टल में घुसा युवक

नारनौल के महर्षि च्यवन मेडिकल कॉलेज में सामने आया यह मामला सीधे-सीधे कॉलेज प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। 31 मार्च की रात कोरियावास गांव के पास छात्राओं के साथ पहले सड़क पर बदतमीजी होती है और फिर वही युवक उनका पीछा करते हुए महिला छात्रावास में घुस जाता है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस हॉस्टल को सबसे सुरक्षित जगह माना जाता है, वहां कोई अनजान व्यक्ति इतनी आसानी से कैसे पहुंच गया?

सूत्रों के अनुसार आरोपी युवक सफाई कर्मचारी बनकर छात्रावास में दाखिल हुआ। यानी कॉलेज प्रशासन की सुरक्षा व्यवस्था सिर्फ कागजों तक सीमित है—न कोई पहचान जांच, न कोई निगरानी। महिला हॉस्टल जैसे संवेदनशील परिसर में इस तरह की घुसपैठ सीधे-सीधे लापरवाही नहीं, बल्कि बड़ी चूक मानी जाएगी।

घटना का पता चलते ही छात्राओं में हड़कंप मच गया और उन्होंने खुद ही आरोपी को पकड़कर उसकी पिटाई कर दी। यह स्थिति खुद बयान करती है कि सुरक्षा के लिए जिम्मेदार लोग कहां थे? क्या अब छात्राओं को ही अपनी सुरक्षा खुद करनी होगी?

डायल 112 मौके पर पहुंची, लेकिन इसके बाद मामला जिस तरह “रफा-दफा” किया गया, उसने पूरे घटनाक्रम को और संदिग्ध बना दिया है। इतने गंभीर मामले को दबाने की कोशिश क्यों की गई? यह सवाल अब कॉलेज प्रशासन के सामने खड़ा है।

मेडिकल कॉलेज के निदेशक डॉ. विजेंद्र ढिल्लों का बयान भी कम चौंकाने वाला नहीं है। उनका कहना है कि छात्राओं ने युवक को माफ कर दिया, इसलिए मामला आगे नहीं बढ़ाया गया। लेकिन क्या महिला छात्रावास में अनधिकृत घुसपैठ जैसा मामला “माफी” से खत्म हो सकता है? क्या यह फैसला प्रशासन का था या जिम्मेदारी से बचने का आसान रास्ता?

सीआईडी जैसी एजेंसी का काम ऐसे मामलों में सच्चाई सामने लाना, सुरक्षा खामियों की जांच करना और जिम्मेदारों की जवाबदेही तय करना होता है, लेकिन यहां तो पूरी व्यवस्था कुंभकर्णी नींद में नजर आ रही है।

और जहां तक स्वास्थ्य मंत्री की बात है, विभाग उनके पास है तो जिम्मेदारी से पूरी तरह किनारा भी नहीं किया जा सकता—कम से कम ऐसे मामलों में सख्ती और जवाबदेही तय करना उनकी भूमिका का हिस्सा जरूर बनता है।

पूरे घटनाक्रम में कॉलेज प्रशासन की भूमिका धृतराष्ट्र जैसी नजर आती है—सब कुछ सामने होते हुए भी आंखें मूंदे बैठा रहा। सुरक्षा व्यवस्था की पोल खुल चुकी है, लेकिन कार्रवाई के बजाय मामले को दबाने का प्रयास और भी गंभीर चिंता का विषय है। अब सवाल साफ है—क्या जिम्मेदारों पर कोई कार्रवाई होगी या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?

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