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यमुनानगर | कलेसर नेशनल पार्क में 8 माह के लेपर्ड की मौत : कैनाइन डिस्टेंपर वायरस की आशंका से वन विभाग अलर्ट
यमुनानगर। हरियाणा के यमुनानगर स्थित कलेसर नेशनल पार्क में करीब आठ महीने के एक लेपर्ड की मौत ने वन एवं वन्यजीव विभाग की चिंता बढ़ा दी है। गंभीर अवस्था में मिले लेपर्ड को रेस्क्यू कर उपचार के लिए लाया गया था, लेकिन इलाज शुरू होने से पहले ही उसकी मौत हो गई। पोस्टमार्टम की प्रारंभिक जांच में लेपर्ड के कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (सीडीवी) से संक्रमित होने की आशंका जताई गई है। अंतिम पुष्टि के लिए बिसरा जांच के लिए प्रयोगशाला भेजा गया है।
तीन विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम ने लेपर्ड का पोस्टमार्टम किया। पोस्टमार्टम करने वाले विशेषज्ञ डॉ. सुखबीर नैन ने बताया कि जांच के दौरान लेपर्ड का लीवर और हार्ट गंभीर रूप से प्रभावित मिला। इसके अलावा आंतों में ब्लीडिंग तथा श्वसन तंत्र में भी संक्रमण और विकार के संकेत पाए गए। उन्होंने बताया कि प्रारंभिक लक्षण कैनाइन डिस्टेंपर वायरस की ओर इशारा करते हैं, हालांकि अंतिम पुष्टि लैब रिपोर्ट आने के बाद ही हो सकेगी।

पशुपालन विभाग के डॉ. सतीश धनिया ने बताया कि पोस्टमार्टम के बाद निर्धारित प्रोटोकॉल के अनुसार लेपर्ड का अंतिम संस्कार कर उसके अवशेषों को सुरक्षित तरीके से जमीन में दफना दिया गया। बीमारी के वास्तविक कारणों की पुष्टि के लिए बिसरा जांच हेतु प्रयोगशाला भेजा गया है, जिसकी रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।
डॉ. सुखबीर नैन ने बताया कि यदि कोई लेपर्ड या अन्य जंगली जानवर इस प्रकार की बीमारी से संक्रमित हो जाता है तो वह सामान्यतः स्वयं को अन्य जानवरों से अलग कर लेता है। ऐसे में संक्रमण पूरे समूह में तेजी से फैलने की संभावना अपेक्षाकृत कम रहती है। इसके बावजूद वन विभाग को पूरी सतर्कता बरतनी चाहिए और जंगल में अन्य वन्यजीवों की लगातार निगरानी करनी आवश्यक है।
लेपर्ड की मौत के बाद वन एवं वन्यजीव विभाग ने कलेसर नेशनल पार्क में निगरानी बढ़ा दी है। अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि यदि किसी भी जंगली जानवर में बीमारी या असामान्य व्यवहार के लक्षण दिखाई दें तो तत्काल उसकी सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को दी जाए। पार्क क्षेत्र में नियमित गश्त और वन्यजीवों की स्वास्थ्य निगरानी भी तेज कर दी गई है।

क्या है कैनाइन डिस्टेंपर वायरस?
कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (सीडीवी) एक अत्यधिक संक्रामक वायरल बीमारी है, जो मुख्य रूप से कुत्तों, सियार, लोमड़ी तथा बाघ, तेंदुए जैसे जंगली मांसाहारी जीवों को प्रभावित करती है। यह वायरस संक्रमित जानवर के सीधे संपर्क या उसके शिकार के माध्यम से दूसरे जानवर में पहुंच सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार यह बीमारी श्वसन तंत्र, पाचन तंत्र और तंत्रिका तंत्र पर गंभीर प्रभाव डालती है तथा कई मामलों में संक्रमित वन्यजीवों की मृत्यु का कारण बनती है।

जैव विविधता का महत्वपूर्ण केंद्र है कलेसर नेशनल पार्क
कलेसर नेशनल पार्क हिमालय की शिवालिक पर्वतमाला की तलहटी में स्थित है और हरियाणा के यमुनानगर जिले में फैला हुआ है। इसकी सीमाएं हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश से मिलती हैं। पार्क का नाम यहां स्थित प्राचीन कलेसर महादेव मंदिर के नाम पर रखा गया है। घने साल के जंगल, खैर वन और घास के मैदानों से समृद्ध यह क्षेत्र तेंदुए, हाथी, सांभर, चीतल, जंगली सूअर सहित अनेक वन्यजीवों का महत्वपूर्ण आवास है।
कलेसर को 8 दिसंबर 2003 को राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया था, जबकि इससे सटा कलेसर वन्यजीव अभयारण्य वर्ष 1996 में अधिसूचित किया गया था। वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की बीमारी के मामलों की समय पर पहचान और निगरानी जैव विविधता संरक्षण के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
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