महेंद्रगढ़। विश्व धरोहर दिवस पर अकादमिक व्याख्यानमाला : उपनिवेशवाद-मुक्त इतिहास दृष्टिकोण पर हुआ मंथन

रिपोर्टर: सुशील शर्मा
| महेंद्रगढ़
हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय में विश्व धरोहर दिवस पर अकादमिक व्याख्यानमाला का आयोजन
हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय में विश्व धरोहर दिवस पर अकादमिक व्याख्यानमाला का आयोजन

महेंद्रगढ़। हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय के इतिहास एवं पुरातत्व विभाग द्वारा विश्व धरोहर दिवस के उपलक्ष्य में अकादमिक व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया। कार्यक्रम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. (डॉ.) टंकेश्वर कुमार, प्रति कुलपति प्रो. पवन कुमार शर्मा तथा सामाजिक विज्ञान एवं मानविकी संकाय की अधिष्ठाता प्रो. पायल कंवर चंदेल के संरक्षण में आयोजित हुआ। कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों को कला, इतिहास, संस्कृति और विरासत संरक्षण के विभिन्न आयामों से परिचित कराना था।

कार्यक्रम का शुभारंभ विभागाध्यक्ष प्रो. तीर्थराज भोई द्वारा किया गया। इस अवसर पर डॉ. के.आर. पलसानिया ने व्याख्यानमाला की विषयवस्तु से प्रतिभागियों को अवगत कराया। कार्यक्रम में आमंत्रित विशेषज्ञ वक्ताओं का स्वागत पुष्पगुच्छ, विश्वविद्यालय स्मृति-चिह्न और पौधा भेंट कर किया गया।

व्याख्यानमाला के प्रथम सत्र में डॉ. आदित्य कौशल ने “पोस्टकोलोनियल हिस्टोरियोग्राफी लेखन की दुविधाएँ” विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि इतिहास शोध में ‘क्या’ और ‘क्यों’ से अधिक ‘कैसे’ पर ध्यान देना आवश्यक है। उन्होंने शोधार्थियों को ऐतिहासिक घटनाओं की अपेक्षा प्रक्रियाओं को समझने पर बल दिया और इतिहास लेखन की चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की।

द्वितीय सत्र में डॉ. मनीष पंवार ने “दिल्ली का औपनिवेशिक अतीत : संस्कृति, विरासत, मनोरंजन और समाज” विषय पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने दिल्ली के सात ऐतिहासिक शहरों का उल्लेख करते हुए 1857 से पहले, 1857 से 1911 के बीच और उसके बाद हुए सामाजिक व सांस्कृतिक परिवर्तनों का विश्लेषण प्रस्तुत किया।

अंतिम सत्र में डॉ. राजेश प्रसाद ने अपनी पुस्तक “कल्चरल ट्रांसफॉर्मेशन : द मेकिंग ऑफ मॉडर्न यूरोप” पर चर्चा की। उन्होंने पुनर्जागरण, ज्ञानोदय और औद्योगिक क्रांति के प्रभावों को समझाते हुए आधुनिक यूरोप के निर्माण की ऐतिहासिक प्रक्रिया पर प्रकाश डाला। साथ ही इमैनुएल कांट, रेने देकार्त, रूसो, वोल्टेयर और मार्टिन लूथर जैसे प्रमुख विचारकों के दर्शन और उनके प्रभावों पर भी विस्तार से चर्चा की।

कार्यक्रम का मुख्य केंद्र भारतीय इतिहास को उपनिवेशवाद-मुक्त दृष्टिकोण से समझने और सांस्कृतिक विरासत संरक्षण के महत्व पर रहा। व्याख्यानमाला में विभाग के 40 से अधिक विद्यार्थियों और शोधार्थियों ने सहभागिता की।

कार्यक्रम के अंत में सह-समन्वयक डॉ. नवज्योत कौर ने सभी वक्ताओं, प्रतिभागियों और आयोजन समिति का धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर डॉ. कैलाश चंद गुर्जर, डॉ. कुलभूषण मिश्रा सहित अन्य शिक्षक और शोधार्थी भी उपस्थित रहे।

Edit By: शिवानी राजपूत
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