ज़िला
नारनौल | वायरल वीडियो की हकीकत पर उठे सवाल : ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आई अलग तस्वीर
नारनौल | महर्षि च्यवन मेडिकल कॉलेज, कोरियावास को लेकर सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो के बाद जहां मेडिकल कॉलेज की व्यवस्थाओं पर सवाल उठाए गए, वहीं ग्राउंड जीरो न्यूज़ की जमीनी पड़ताल में मामला काफी अलग सामने आया। विभागीय अधिकारियों, अस्पताल प्रशासन, रिकॉर्ड और ओपीडी रजिस्टर की जांच में कई ऐसे तथ्य सामने आए हैं जिन्होंने वायरल वीडियो की विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।

स्वास्थ्य सेवाओं के बीच रिकॉर्ड अपडेट करती नर्सिंग अधिकारी।
सूत्रों के अनुसार वीडियो वायरल करने वाला व्यक्ति बिना अनुमति सीधे अल्ट्रासाउंड रूम में घुस गया था, जबकि उस समय अंदर एक महिला मरीज का अल्ट्रासाउंड किया जा रहा था। अस्पताल प्रशासन का कहना है कि यह मेडिकल प्रोटोकॉल और मरीज की गोपनीयता का सीधा उल्लंघन था। इस घटना से वहां मौजूद स्टाफ और मरीज दोनों असहज हो गए थे।
अस्पताल सूत्रों ने यह भी स्पष्ट किया कि वीडियो में लगाए गए कई आरोप वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाते। मेडिकल कॉलेज में सीमित संसाधनों और स्टाफ की भारी कमी के बावजूद मात्र एक ही रेडियोलॉजिस्ट द्वारा लगातार मरीजों की जांच की जा रही है। इमरजेंसी मरीजों को प्राथमिकता देते हुए अल्ट्रासाउंड, एक्स-रे और सीटी स्कैन जैसी सुविधाएं उपलब्ध करवाई जा रही हैं।

शिकायत देने वाला
दो मई के विभागीय रिकॉर्ड के अनुसार केवल एक ही दिन में रेडियोलॉजी विभाग में 19 अल्ट्रासाउंड, 11 एक्स-रे और 2 सीटी स्कैन किए गए। वहीं पिछले एक सप्ताह की रेंडम रिपोर्ट और ओपीडी रजिस्टर की जांच में यह भी सामने आया कि विभाग में प्रतिदिन औसतन करीब 150 मरीजों की ओपीडी हो रही है। इन आंकड़ों ने यह स्पष्ट कर दिया कि सीमित संसाधनों के बावजूद विभाग नियमित रूप से कार्य कर रहा है।
पड़ताल में एक और अहम तथ्य सामने आया कि प्रदेश के अन्य बड़े मेडिकल कॉलेज भी रेडियोलॉजिस्ट की कमी से जूझ रहे हैं। जानकारी के अनुसार नूंह मेडिकल कॉलेज में कोई रेडियोलॉजिस्ट नहीं है। करनाल के कल्पना चावला मेडिकल कॉलेज में भी हाल तक रेडियोलॉजिस्ट की नियुक्ति नहीं हो पाई थी। ऐसे हालात में नारनौल मेडिकल कॉलेज में एक रेडियोलॉजिस्ट के सहारे लगातार सेवाएं देना अपने आप में बड़ी चुनौती के साथ साथ राहत की बात ही माना जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार कई बार बिजली की अनियमित सप्लाई और तकनीकी दिक्कतों के बावजूद विभाग का स्टाफ मरीजों को राहत देने का प्रयास कर रहा है। ऐसे में सोशल मीडिया पर केवल एक पक्ष दिखाकर पूरे विभाग को कटघरे में खड़ा करना कई सवाल पैदा करता है।
मेडिकल कॉलेज को लेकर राजनीति, सत्ता पक्ष के सभी नेता कठघरे में |
इसी बीच एक और बड़ा सवाल अब चर्चा का विषय बना हुआ है। नारनौल का महर्षि च्यवन मेडिकल कॉलेज जब से आनन-फानन में शुरू किया गया है, तब से यह लगातार मीडिया की सुर्खियों में बना हुआ है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस मेडिकल कॉलेज में करीब 3200 कर्मचारियों का स्टाफ होना चाहिए जिसमें फोर्थ क्लास कर्मचारी से लेकर विशेषज्ञ डॉक्टर तक शामिल हैं वहां वर्तमान में केवल लगभग 200 से 250 कर्मचारियों के सहारे व्यवस्था चलाई जा रही है।
ऐसी परिस्थितियों में सवाल केवल स्वास्थ्य विभाग या स्वास्थ्य मंत्रालय पर ही क्यों उठाए जाएं? क्या जिले के भाजपा नेताओं, पदाधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती? क्या उन्हें यह जानकारी नहीं कि मेडिकल कॉलेज को पूरी क्षमता से चलाने में किन-किन विभागों की बाधाएं सामने आ रही हैं? क्या सत्ता पक्ष के नेताओं का यह दायित्व नहीं बनता कि वे एकजुट होकर हरियाणा सरकार और केंद्र सरकार के समक्ष मेडिकल कॉलेज के लिए अतिरिक्त स्टाफ, संसाधन और सुविधाओं की मांग रखें?
स्थानीय लोगों के बीच अब यह चर्चा भी तेज हो रही है कि कहीं मेडिकल कॉलेज को लेकर राजनीति तो नहीं हो रही। लोगों का कहना है कि यदि सभी जनप्रतिनिधि गंभीरता से प्रयास करें तो यह मेडिकल कॉलेज पूरे क्षेत्र के लिए बड़ी स्वास्थ्य सौगात बन सकता है। फिलहाल सीमित स्टाफ और संसाधनों के बावजूद यहां कार्यरत कर्मचारी और डॉक्टर व्यवस्था को संभालने का प्रयास कर रहे हैं, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
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