ज़िला
नारनौल | महिला आरक्षण पर विपक्ष का प्रचार भ्रामक : संवैधानिक प्रक्रिया समझना जरूरी : डॉ. अभय यादव
महिला आरक्षण पर चल रहे राजनीतिक द्वंद पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए पूर्व सिंचाई मंत्री डॉक्टर अभय सिंह यादव ने कहा कि विपक्ष द्वारा महिला आरक्षण पर किया जा रहा प्रचार आम आदमी को भ्रमित करने वाला है। उन्होंने इसके क़ानूनी पहलू पर स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि यह संविधान में दिए गए प्रावधानों के अनुसार एक आवश्यक प्रक्रिया है जिसको पूरा किए बिना महिला आरक्षण को ज़मीन पर लाना संभव नहीं है। उन्होंने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि संविधान की धारा 81 और 82 में दिए गए प्रावधानों में यह स्पष्ट संवैधानिक व्यवस्था है कि प्रत्येक दस साल के बाद में होने वाली जनगणना के प्रथम आंकड़ों के आधार पर हर 10 वर्ष बाद लोक सभा एवं सभी प्रदेश के विधानसभाओं का पुनर्निर्धारण जनसंख्या के अनुपात में किया जाएगा। इसे परिसीमन कहा जाता है।
संविधान की इस मूल व्यवस्था को बदलते हुए वर्ष 1976 में 42 वें संविधान संशोधन के माध्यम से इस व्यवस्था में संशोधन करते हुए लोकसभा एवं सभी प्रदेश की विधानसभाओं के परिसीमन के लिए 1971 की जनगणना के आधार पर उनकी संख्या वर्ष 2001 तक स्थिर कर दी गई। इसके बाद वर्ष 2001 में पुनः 84वें संविधान संशोधन द्वारा 1971 की जनसंख्या के आधार पर ही अगले पच्चीसवर्ष के लिए 2026 की जनगणना के प्रारंभिक आंकड़ों तक स्थिर कर दी गई ।
इसी बीच वर्ष 2023 में संविधान के 106वें संशोधन के माध्यम से महिलाओं को लोक सभा एवं सभी प्रदेश विधानसभाओं में 33 प्रतिशत का आरक्षण प्रदान किया गया तथा साथ साथ इसमें यह प्रावधान भी किया गया कि इस आरक्षण के क़ानून बनने के उपरांत होने वाली प्रथम जनगणना के उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर परिसीमन किया जाएगा और ऐसा माना गया कि यह आरक्षण 2029 के आगामी चुनावों में लागू कर दिया जाएगा । परंतु वर्तमान जनगणना की निश्चित तिथि 1 मार्च 2027 है जब उक्त जनगणना के आंकड़े परिसीमन के लिए उपलब्ध हो पाएंगे।
इस स्थिति में 2027 के उपरांत 2029 के चुनाव से पहले परिसीमन को पूरा किया जाना संभव नहीं हो पाएगा क्योंकि पिछले परिसीमन में परिसीमन आयोग का गठन वर्ष 2002 में हुआ और यह परिसीमन वर्ष 2008 में पूरा हो पाया था। अतः वर्तमान परिस्थितियों में 2027 में प्रारंभ करने पर 2029 के चुनाव से पहले परिसीमन पूरा नहीं किया जा सकता। इसके परिणाम स्वरूप महिला आरक्षण 2029 के चुनावों में लागू किया जाना संभव नहीं होगा ।
इन परिस्थितियों में सरकार ने 131वें संविधान संशोधन के माध्यम से 2029 में महिला आरक्षण लागू करने का एक समाधान प्रस्तुत किया है । इस संशोधन विधेयक में प्रस्तावित किया गया है। क्योंकि वर्तमान जनगणना के जनसंख्या आंकड़े समय पर उपलब्ध नहीं हो रहे अतः 2011 की पिछली जनसंख्या को आधार मानते हुए परिसीमन करने का प्रस्ताव सरकार लेकर आयी है । इसमें लोकसभा और प्रदेश की विधानसभाओं की संख्या में 50 प्रतिशत की वृद्धि प्रस्तावित की है तथा इसमें 2011 की जनसंख्या के आधार पर परिसीमन को अंतिम रूप दिया जाना है । इसके साथ ही परिसीमन करने के लिए परिसीमन आयोग का प्रस्ताव भी सरकार ने पेश किया है।
परंतु विपक्ष की ज़िद यह है कि वर्तमान में परिसीमन भी 1971 की पुरानी जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ही किया जाए तथा सदस्यों की कुल संख्या को पहले की तरह ही स्थिर रखा जाए। विपक्ष का यह तर्क काल चक्कर की घड़ी को उल्टा घुमाने जैसा है। संविधान की मूल धाराएँ बहुत स्पष्ट रूप से हर 10 वर्ष के बाद में उपलब्ध जनगणना के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन करने का प्रावधान करती हैं ।वर्तमान परिपेक्ष में जब वर्तमान जनगणना के आंकड़े समय पर उपलब्ध नहीं हो रहे हैं तो इससे पिछली जनगणना अर्थात 2011 के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन ही एक मात्र विकल्प है।
परन्तु पचास वर्ष पहले 1971 की जनगणना के आधार पर लोक सभा और प्रदेश विधानसभाओं की संख्या स्थिर करना समय के विपरीत चलने जैसी बात है। देश की लगभग आधी आबादी, नारी शक्ति को विधायिका में आरक्षण देना भारत के प्रजातंत्र का एक ऐतिहासिक क़दम है जिसे सभी राजनीतिक दलों को मिलकर आपसी सहयोग और समझ से यथार्थ में बदलना प्रत्येक राजनीतिक दल का नैतिक एवं राजनैतिक कर्तव्य है जिसे हर हालत में निभाना चाहिए। सभी को साथ मिल बैठकर इसका समाधान निकालना होगा।
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