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रेवाड़ी। सफर सृष्टि का’ का 31 मई को होगा लोकार्पण : विज्ञान, इतिहास और अध्यात्म का अनूठा संगम | हुकुमदेव नारायण यादव होंगे मुख्य अतिथि
रेवाड़ी। लब्धप्रतिष्ठ लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता मित्र राधेश्याम गोमला द्वारा लिखित और निर्मला प्रकाशन चरखी दादरी द्वारा प्रकाशित ग्रंथ ‘सफर सृष्टि का’ का आगामी 31 मई रविवार को लोकार्पण किया जाएगा। इस अवसर पर पद्म-भूषण अवार्डी पूर्व सांसद हुकुमदेव नारायण यादव बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित होंगे। रेवाडी के विधायक लक्ष्मण सिंह यादव कार्यक्रम की अध्यक्षता करेंगे।

‘सफर सृष्टि का’ पुस्तक के लेखक राधेश्याम गोमला और पुस्तक का आवरण चित्र।
इसकी जानकारी देते हुए पुस्तक के लेखक मित्र राधेश्याम गोमला के पुत्र विराट गोमला ने एक प्रेस विज्ञप्ति के जरिए बताया कि जिला रेवाडी के धारूहेडा में स्थित जंगल बबलर ट्युरिजम कॉम्प्लेक्स में आयोजित कार्यक्रम में बडी संख्या में क्षेत्र के साहित्य और शिक्षाप्रेमी उपस्थित रहेंगे।
विराट ने बताया कि लोकार्पित पुस्तक समकालीन हिन्दी साहित्य में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण, व्यापक और वैचारिक कृति है। यह केवल एक सामान्य पुस्तक नहीं, बल्कि विज्ञान, इतिहास, दर्शन, अध्यात्म, मानव-विकास और भविष्य-दृष्टि का समन्वित बौद्धिक दस्तावेज है। इसमें ब्रह्मांड की उत्पत्ति से लेकर वर्तमान तक की यात्रा को बडी रोचकता, शोधपरकता और साहित्यिक सौंदर्य के साथ प्रस्तुत किया है।

‘सफर सृष्टि का’ पुस्तक का 31 मई को लोकार्पण, विज्ञान-इतिहास और अध्यात्म का अनूठा संगम
विराट ने जानकारी दी कि ‘सफर सृष्टि का’ पुस्तक में बिग-बैंग सिद्धांत, ब्रह्मांड-विज्ञान, मानव-उत्पत्ति, सभ्यताओं का विकास, वेद-उपनिषद, संवत-प्रणालियाँ, भविष्य-विज्ञान और चेतना जैसे अनेक विषय एक ही धारा में प्रवाहित होते हैं। इसमें ज्ञान की विभिन्न धाराओं को एक सूत्र में बाँधने का साहस किया है।
लेखक के पुत्र ने जानकारी दी इस कृति की सबसे अनूठी उपलब्धि इसकी “पॉडकास्टीय-चंपू शैली” है। हिन्दी साहित्य में यह प्रयोग अत्यंत नवीन और मौलिक है। लेखक ने आधुनिक पॉडकास्ट संस्कृति को प्राचीन चंपू परंपरा से जोड़कर एक ऐसी शैली निर्मित की है, जिसमें संवाद, नाटकीयता, गद्य, पद्य, दृश्यात्मकता और श्रव्य अनुभूति का अद्भुत मिश्रण दिखाई देता है। पुस्तक के संवाद केवल प्रश्नोत्तर नहीं हैं, बल्कि वे आधुनिक मनुष्य की जिज्ञासा और प्राचीन ज्ञान-परंपरा के बीच सेतु का कार्य करते हैं।
पाठक को ऐसा अनुभव होगा जैसे वह किसी बौद्धिक पॉडकास्ट को सुन और देख रहा हो। यह शैली विशेष रूप से नई पीढ़ी के पाठकों को आकर्षित करने की क्षमता रखती है।
विराट ने बताया कि पुस्तक में सिंगुलैरिटी, बिग-बॉउन्स, बिग-बैंग, ब्रह्मांड निर्माण, पृथ्वी निर्माण और जैव-विकास की यात्रा को वैज्ञानिक तथ्यों सहित क्रमवार प्रस्तुत किया है। आधुनिक विज्ञान जहाँ डार्क-मैटर, डार्क-एनर्जी और क्वांटम सिद्धांतों के माध्यम से ब्रह्मांड को समझने का प्रयास करता है, वहीं लेखक ऋग्वेद, नासदीय सूक्त और ईशोपनिषद के संदर्भों द्वारा यह दिखाने का प्रयास करते हैं कि प्राचीन भारतीय चिंतन में भी ब्रह्मांडीय रहस्यों को लेकर गहन मंथन हुआ था।
विराट के अनुसार पुस्तक की भाषा अत्यंत प्रवाहपूर्ण और जनसुलभ है। लेखक ने वैज्ञानिक और दार्शनिक विषयों को भी सरल हिन्दी में व्यक्त किया है। पुस्तक में सिंधु-सारस्वत सभ्यता, मेहरगढ़, राखीगढ़ी, धोलावीरा, सुमेरियन सभ्यता, मिस्र, माया सभ्यता और अन्य प्राचीन संस्कृतियों का उल्लेख करते हुए मानव विकास की वैश्विक यात्रा को सामने रखा है। पुस्तक में विभिन्न संवतों—सप्तऋषि संवत्, युधिष्ठिर संवत्, विक्रमी संवत्, कलि संवत् आदि—का उल्लेख करके भारतीय कालगणना की समृद्ध परंपरा को भी सामने रखा है।
विराट ने बताया कि पुस्तक में मानव चेतना, मस्तिष्क, आत्मा, स्वभाव, भ्रूण-विकास और भावी वैज्ञानिक संभावनाओं पर भी विचार किया गया है ।
विराट गोमला का कहना है कि ‘सफर सृष्टि का’ केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि ज्ञान की बहुआयामी यात्रा है। यह पाठक को ब्रह्मांड की विराटता का अनुभव कराएगी और मानव सभ्यता की जड़ों से परिचित करवाएगी। इसमें विज्ञान है, दर्शन है, अध्यात्म है, इतिहास है, साहित्य है और सबसे बढ़कर जिज्ञासा है। यह कृति हिन्दी साहित्य में एक साहसिक और मौलिक प्रयोग है। इसकी व्यापक विषय-वस्तु, शोधपरक दृष्टि, सरल भाषा, साहित्यिक शैली और बौद्धिक गहराई इसे समकालीन हिन्दी जगत में विशिष्ट स्थान प्रदान करती है। यह पुस्तक उन पाठकों के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है जो ब्रह्मांड, मानव-उत्पत्ति, सभ्यताओं, विज्ञान और अध्यात्म के अंतर्संबंधों को समझना चाहते हैं।
‘सफर सृष्टि का’ वास्तव में एक ऐसी ज्ञान-यात्रा है, जो पाठक को बाहरी ब्रह्मांड के साथ-साथ उसके भीतर के ब्रह्मांड से भी परिचित कराती है। यही इस पुस्तक की सबसे बड़ी सफलता है।
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