नांगल चौधरी | डीडीपीओ निलंबन पर बढ़ा विवाद : कर्मचारियों, जनप्रतिनिधियों के बाद जाट सभा भी उतरी समर्थन में | कार्रवाई पर उठे सवाल

रिपोर्टर: रामपाल फ़ौजी
| नांगल चौधरी

 नांगल चौधरी | नारनौल में डीडीपीओ के निलंबन का मामला अब प्रशासनिक कार्रवाई से आगे बढ़कर राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय बनता जा रहा है। महेंद्रगढ़ के डीडीपीओ प्रमोद कुमार के निलंबन के विरोध में पहले पंचायती राज कर्मचारियों ने ज्ञापन दिया, फिर हजारों जनप्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा और अब सामाजिक संगठन भी खुलकर सामने आने लगे हैं। जाट सभा ने स्वास्थ्य मंत्री की कार्रवाई की निंदा करते हुए इसे राजनीतिक द्वेष से प्रेरित बताया है।

हालांकि सरकार या स्वास्थ्य मंत्री की ओर से इन आरोपों की पुष्टि नहीं की गई है। सवाल यह है कि यदि एक अधिकारी को बैठक में देरी के आधार पर तत्काल निलंबित किया जाता है, तो क्या इससे प्रशासनिक तंत्र में भय का माहौल बनेगा और क्या इसका असर ईमानदार अधिकारियों के मनोबल पर पड़ेगा? यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है।

महेंद्रगढ़ में डीडीपीओ प्रमोद कुमार के निलंबन का मामला अब लगातार तूल पकड़ता जा रहा है। चार दिन पहले हजारों सरपंचों, पंचों और जनप्रतिनिधियों ने सड़क पर उतरकर मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा था। इससे पहले जिले भर के पंचायती राज विभाग के कर्मचारियों ने भी जिला उपायुक्त के माध्यम से अपना विरोध दर्ज कराया था।

अब इस मुद्दे पर सामाजिक संगठन भी खुलकर सामने आने लगे हैं। नांगल चौधरी जाट सभा ने बैठक कर स्वास्थ्य मंत्री की कार्रवाई के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित किया और आरोप लगाया कि यह फैसला राजनीतिक कारणों से लिया गया। हालांकि इन आरोपों पर सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

बताया जा रहा है कि स्वास्थ्य मंत्री की समीक्षा बैठक में करीब 15 मिनट की देरी से पहुंचने के बाद डीडीपीओ प्रमोद कुमार को निलंबित कर दिया गया था। इसी कार्रवाई को लेकर प्रदेश में प्रशासनिक कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं। विरोध कर रहे जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि ईमानदार अधिकारियों के साथ भी इसी तरह की कठोर कार्रवाई होगी, तो इससे पूरे प्रशासनिक तंत्र का मनोबल प्रभावित हो सकता है।

जानकारों का मानना है कि सरकार के लिए भी ऐसे विवाद राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर चुनौती बन सकते हैं, क्योंकि इससे अधिकारियों में निर्णय लेने का भय पैदा होने और शासन-प्रशासन की कार्यक्षमता प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार इस पूरे मामले में आगे क्या फैसला लेती है।

Edit By: शिवानी राजपूत
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