नारनौल में खेती की नई क्रांति : पटीकरा बना प्राकृतिक खेती का मॉडल | जहर मुक्त खेती से बढ़ी किसानों की आमदनी

अमित यादव
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महेंद्रगढ़ (नारनौल )

जहर मुक्त खेती का मॉडल
जहर मुक्त खेती का मॉडल

नारनौल के पास पटीकरा गांव में किसानों ने केमिकल खेती छोड़ प्राकृतिक खेती अपनाकर नई मिसाल पेश की है। यह मॉडल अब किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए भी फायदेमंद साबित हो रहा है।

नारनौल के समीप स्थित पटीकरा गांव आज खेती के क्षेत्र में एक नई पहचान बना रहा है, जहां युवा किसानों ने पारंपरिक रासायनिक खेती को छोड़कर प्राकृतिक और जैविक खेती की दिशा में बड़ा बदलाव किया है। यह बदलाव केवल तकनीक तक सीमित नहीं है, बल्कि सोच में भी बदलाव को दर्शाता है, जहां किसान अब अधिक उत्पादन के बजाय बेहतर गुणवत्ता और स्थायी आय पर ध्यान दे रहे हैं।

पटीकरा में हो रही इस खेती की गूंज अब देश ही नहीं बल्कि विदेशों तक पहुंच रही है। गांव में स्थित कृषि प्रशिक्षण केंद्र के अनुसार जापान, चीन और कनाडा जैसे देशों से कृषि विशेषज्ञ और शोधकर्ता यहां की प्राकृतिक खेती को समझने और देखने के लिए पहुंच रहे हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह मॉडल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बना रहा है।

यहां के किसान गोबर, गौमूत्र, जीवामृत, घनजीवामृत और देसी बीजों का उपयोग कर खेती कर रहे हैं और रासायनिक खाद तथा जहरीले कीटनाशकों का पूरी तरह से बहिष्कार किया गया है। इससे न केवल मिट्टी की उर्वरता बनी हुई है, बल्कि फसलों की गुणवत्ता और स्वाद में भी सुधार देखने को मिला है।

स्थानीय किसानों के अनुसार इस पद्धति से खेती करने पर लागत में भारी कमी आई है क्योंकि महंगे रासायनिक खाद और दवाइयों का खर्च लगभग समाप्त हो गया है। वहीं बाजार में जैविक उत्पादों की मांग अधिक होने के कारण उन्हें बेहतर दाम मिल रहे हैं, जिससे मुनाफा भी बढ़ा है। इसके साथ ही फसल पर बीमारियों का असर कम हुआ है और जोखिम भी घटा है।

इस मॉडल का लाभ उपभोक्ताओं को भी मिल रहा है, जिन्हें बिना जहर की सब्जियां और अनाज मिल रहे हैं, जिससे स्वास्थ्य संबंधी जोखिम कम हो रहे हैं और पौष्टिकता बढ़ रही है।

पटीकरा में एफपीओ मॉडल के जरिए किसान सीधे उपभोक्ताओं तक अपनी उपज पहुंचा रहे हैं, जिससे बिचौलियों की भूमिका कम हुई है और किसानों को बेहतर मूल्य मिल रहा है। इससे खेती एक संगठित और लाभकारी व्यवसाय के रूप में उभर रही है।

यह मॉडल युवाओं के लिए भी प्रेरणा बन रहा है, जहां खेती को अब केवल पारंपरिक कार्य नहीं बल्कि एक स्टार्टअप और व्यवसाय के रूप में देखा जा रहा है। कई युवा अब खेती को करियर के रूप में अपना रहे हैं और आधुनिक तकनीकों के साथ इसे आगे बढ़ा रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में वही किसान सफल होगा जो कम लागत, बेहतर गुणवत्ता और सीधे बाजार से जुड़ाव पर काम करेगा। पटीकरा का यह मॉडल दक्षिण हरियाणा ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक नई दिशा दिखा रहा है और यह संदेश दे रहा है कि सही तरीके से की गई खेती न केवल लाभकारी हो सकती है, बल्कि पर्यावरण और स्वास्थ्य की भी रक्षा कर सकती है।

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