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नांगल चौधरी | अरावली की पहाड़ियां फिर धधकीं : एक सप्ताह में दूसरी बड़ी आग | 5 घंटे की मशक्कत के बाद पाया काबू
नांगल चौधरी | दक्षिण हरियाणा के नांगल चौधरी क्षेत्र स्थित शाहबाजपुर की अरावली पहाड़ियों में एक बार फिर भीषण आग लगने से पूरे इलाके में हड़कंप मच गया। आग ने देखते ही देखते जंगल और पहाड़ी क्षेत्र के बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया। दूर-दूर तक उठते धुएं के गुबार और आग की ऊंची लपटों ने स्थानीय लोगों में दहशत पैदा कर दी। सूचना मिलते ही प्रशासन, वन विभाग और दमकल विभाग की टीमें मौके पर पहुंचीं। पहाड़ी क्षेत्र में आग इतनी तेजी से फैली कि उसे नियंत्रित करने में करीब 5 घंटे का समय लग गया।

आग की चपेट में आई अरावली की वनस्पति, मौके पर राहत एवं बचाव कार्य में जुटी टीमें।
मौके पर पहुंची दर्जनों फायर ब्रिगेड की गाड़ियों ने लगातार अभियान चलाकर आग पर काबू पाया। हालांकि अरावली का यह इलाका पूरी तरह पहाड़ी और दुर्गम होने के कारण दमकल विभाग को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा। कई स्थानों तक दमकल की गाड़ियां नहीं पहुंच सकीं, जिसके चलते फायर कर्मियों को जंगल के अंदर पैदल उतरकर आग बुझानी पड़ी। तेज गर्मी, सूखी झाड़ियां और तेज हवा के बीच फायर कर्मियों ने घंटों संघर्ष कर आग को फैलने से रोका। फिलहाल आग लगने के कारणों का स्पष्ट पता नहीं चल पाया है।
आखिर क्यों बार-बार जल रहा है दक्षिण हरियाणा का “ग्रीन कवच” ?
गौरतलब है कि पिछले एक सप्ताह के भीतर नांगल चौधरी क्षेत्र में अरावली में आग लगने की यह दूसरी बड़ी घटना है। इससे पहले भी अरावली पहाड़ियों में भीषण आग लगी थी, जिस पर करीब 12 घंटे की मशक्कत के बाद काबू पाया गया था। लगातार हो रही घटनाओं ने वन विभाग और प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। स्थानीय लोग अब सवाल उठा रहे हैं कि आखिर अरावली क्षेत्र में बार-बार आग क्यों लग रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार अरावली क्षेत्र में आग लगने के पीछे सबसे बड़ा कारण भीषण गर्मी और सूखी वनस्पति मानी जाती है। गर्मियों में जंगलों की सूखी घास, पत्तियां और झाड़ियां बेहद तेजी से आग पकड़ लेती हैं। इसके अलावा जंगलों में फेंकी गई जलती बीड़ी-सिगरेट, प्लास्टिक कचरा और कांच की बोतलें भी आग फैलने का कारण बनती हैं। कई मामलों में शरारती तत्वों द्वारा जानबूझकर आग लगाने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता। वन क्षेत्रों में लगातार बढ़ती मानवीय गतिविधियां और निगरानी की कमी भी आगजनी की घटनाओं को बढ़ावा देती हैं। विशेषज्ञों की रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि देश में करीब 90 प्रतिशत जंगलों की आग मानवीय कारणों से लगती है।

नांगल चौधरी की अरावली पहाड़ियों में फैली आग को बुझाने में जुटे फायर कर्मी।
अरावली पर्वतमाला केवल पहाड़ियां नहीं बल्कि उत्तर भारत के पर्यावरण का सुरक्षा कवच मानी जाती है। यह पर्वतमाला राजस्थान के रेगिस्तान को हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर की तरफ बढ़ने से रोकती है तथा भूजल स्तर और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार अरावली क्षेत्र उत्तर भारत के “ग्रीन लंग्स” के रूप में काम करता है और यह क्षेत्र धूल प्रदूषण तथा तापमान नियंत्रण में भी अहम भूमिका निभाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार लग रही आग से जंगलों की वनस्पति, छोटे जीव-जंतु और जैव विविधता को भारी नुकसान पहुंच रहा है। अरावली क्षेत्र तेंदुए, सियार, नीलगाय, पक्षियों और कई दुर्लभ प्रजातियों का प्राकृतिक आवास माना जाता है। लगातार आग लगने से वन्यजीवों के जीवन पर भी खतरा बढ़ रहा है।
आग की घटनाओं को रोकने के लिए पर्यावरण विशेषज्ञ और वन विभाग कई उपायों पर जोर दे रहे हैं। इनमें जंगलों में फायर लाइन बनाना, वॉच टावर स्थापित करना, फायर वॉचर तैनात करना, जंगलों में कचरा और सूखी घास की नियमित सफाई, ड्रोन निगरानी और स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ाना शामिल है। हाल ही में हरियाणा वन विभाग ने अरावली क्षेत्र में आग रोकने के लिए पानी के टैंकर, फायर रिस्पॉन्स सिस्टम और विशेष निगरानी बढ़ाने की बात भी कही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते अरावली क्षेत्र की सुरक्षा के लिए स्थायी इंतजाम नहीं किए गए तो आने वाले समय में दक्षिण हरियाणा का यह प्राकृतिक सुरक्षा कवच गंभीर संकट में पड़ सकता है। लगातार बढ़ रही आग की घटनाओं ने अब प्रशासन और वन विभाग की तैयारियों पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
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