नारनौल | नगर परिषद या घोटाला परिषद : स्ट्रीट लाइट ठेके में बड़ा खेल | छह महीने बाद भी FCC की मंजूरी नहीं

रिपोर्टर: रामचन्द्र सैनी
| नारनौल

नारनौल | नगर परिषद का कार्यकाल चार साल होने को है। जैसे जैसे समय पूरा होता जा रहा है, नप के नए नए कारनामे जनता के सामने आ रहे हैं। इस बार मामला शहर की स्ट्रीट लाइटों के मेंटेनेंस ठेके से जुड़ा है, जहां रिकॉर्ड खंगालने पर कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। रिकॉर्ड के अनुसार 4 दिसंबर 2025 को समाप्त हो चुके स्ट्रीट लाइट मेंटेनेंस ठेके को बिना किसी नए टेंडर और बिना फाइनेंस एंड कॉन्ट्रैक्ट कमेटी (FCC) की मंजूरी के आगे बढ़ा दिया गया।

हैरानी की बात यह है कि नगर परिषद के अधिकारियों ने पुरानी फर्म से ही काम जारी रखा, लेकिन इस विस्तार को आज तक फाइनेंस कॉन्ट्रैक्ट कमेटी से अनुमोदित नहीं कराया गया। अब जब फर्म द्वारा किए गए कार्य का भुगतान रोका गया है तो पूरे मामले पर सवाल उठने लगे हैं।

सबसे बड़ा सवाल – जब ठेका बढ़ाया गया तो FCC में प्रस्ताव क्यों नहीं रखा गया?

नगर परिषद के रिकॉर्ड के अनुसार पुराना ठेका समाप्त होने के बाद नई निविदा प्रक्रिया पूरी नहीं हुई थी। ऐसे में प्रशासनिक स्तर पर उसी फर्म से कार्य जारी रखने का निर्णय लिया गया। लेकिन यदि यह निर्णय लिया गया था तो उसे एफसीसी की बैठक में स्वीकृति के लिए क्यों नहीं भेजा गया।

यदि नियमों के अनुसार कार्य कराया गया था तो भुगतान रोकने का आधार क्या है और यदि नियमों के विपरीत कार्य कराया गया तो छह महीने तक काम क्यों लिया गया।

फर्म का दोष नहीं, फिर भुगतान क्यों रोका गया?
सूत्रों के अनुसार संबंधित फर्म लगातार शहर की स्ट्रीट लाइटों का रखरखाव करती रही। फर्म का कहना है कि उसने नगर परिषद के निर्देशों के अनुसार कार्य किया और अधिकारियों की जानकारी में ही सेवाएं जारी रखीं।

अब फर्म के छह महीने के भुगतान पर रोक लगने से सवाल उठ रहे हैं कि आखिर इसकी जिम्मेदारी किसकी है? यदि प्रक्रिया में कोई कमी थी तो उसका जिम्मेदार ठेकेदार है या नगर परिषद के अधिकारी।

11 जून तक भुगतान नहीं तो लाइटें बंद करने की चेतावनी
मामला तब और गंभीर हो गया जब ठेकेदार ने नगर परिषद अधिकारियों को लिखित पत्र भेजकर चेतावनी दी कि यदि 11 जून तक लंबित भुगतान नहीं किया गया तो वह स्ट्रीट लाइटों का संचालन और मेंटेनेंस कार्य बंद कर देगा।

यदि ऐसा होता है तो पूरे शहर की स्ट्रीट लाइट व्यवस्था प्रभावित हो सकती है और इसकी सीधी मार आम नागरिकों को झेलनी पड़ेगी।

पेमेंट अप्रूवल कमेटी की बैठक में आखिर किसने रोका बिल?
नगर परिषद के अंदर चर्चा इस बात की भी है कि अधिकारियों और संबंधित कमेटी के अधिकांश सदस्य भुगतान के पक्ष में बताए जा रहे हैं। इसके बावजूद हाल ही में हुई पेमेंट अप्रूवल कमेटी की बैठक में केवल स्ट्रीट लाइट मेंटेनेंस का बिल ही रोक दिया गया।

अब बड़ा सवाल यह है कि

आखिर छह महीने का बिल किसके कहने पर रोका गया।

क्या भुगतान रोकने के पीछे कोई तकनीकी आपत्ति थी या कोई और वजह।

यदि आपत्ति थी तो पहले छह महीने तक क्यों नहीं उठाई गई।
क्या किसी अधिकारी या जनप्रतिनिधि ने इस भुगतान पर आपत्ति दर्ज कराई?

सवालों के घेरे में नगर परिषद

पूरे मामले ने नगर परिषद की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। छह महीने तक काम लेने की अनुमति किसने दी। भुगतान रोकने का आदेश किसने दिया। यदि प्रक्रिया गलत थी तो जिम्मेदार अधिकारी कौन है और यदि प्रक्रिया सही थी तो ठेकेदार को भुगतान से क्यों वंचित रखा जा रहा है।

स्ट्रीट लाइट मेंटेनेंस का यह मामला अब केवल भुगतान विवाद नहीं रहा, बल्कि नगर परिषद में नियमों, पारदर्शिता और जवाबदेही पर बड़ा प्रश्नचिह्न बनकर उभर रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि नगर परिषद इन सवालों का जवाब देती है या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।

हैरानी की बात तो यह है जब इस मामले में नगर परिषद के ईओ जोगेंद्र सिंह से बातचीत की गई तो उन्होंने केवल इतना कहा कि यह उनका ऑफिशियल मामला है।

Edit By: शिवानी राजपूत
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