ज़िला
नारनौल। क्या नगर परिषद की करोड़ों की जमीन पर डाका डालने की तैयारी : स्वामित्व योजना की फाइलों में अचानक आई रफ्तार से उठे बड़े सवाल
नारनौल। हरियाणा सरकार की स्वामित्व योजना के नाम पर नारनौल नगर परिषद की करोड़ों रुपये मूल्य की व्यावसायिक दुकानों में बड़ा खेला होने की आशंकाएं जताई जा रही हैं। वर्षों से ऑब्जेक्शन लगाकर रोकी गई फाइलों पर अचानक आई तेजी ने नगर परिषद के गलियारों से लेकर व्यापारिक क्षेत्र तक चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है।
सूत्रों के अनुसार नई मंडी क्षेत्र की करीब 17 फाइलों पर दोबारा तेजी से काम शुरू किया गया है। हैरानी की बात यह है कि जिन फाइलों को पहले नियमों के आधार पर रोक दिया गया था, वही फाइलें अब फिर से सक्रिय हो गई हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर ऐसा क्या बदल गया कि वर्षों तक अटकी फाइलें अचानक प्राथमिकता बन गईं?
जानकारों का कहना है कि हरियाणा सरकार की स्वामित्व योजना का उद्देश्य केवल उन पात्र व्यक्तियों को स्वामित्व अधिकार देना है जो वर्षों से नगर परिषद की दुकानों या भूमि पर वैध किरायेदारी अथवा तहबाजरी के आधार पर बैठे हुए हैं। नियम साफ कहते हैं कि जितने क्षेत्रफल का रिकॉर्ड उपलब्ध है, स्वामित्व का अधिकार भी केवल उसी क्षेत्र तक सीमित रहेगा।
लेकिन नई मंडी से जुड़ी कई फाइलों पर इसी वजह से वर्षों पहले ऑब्जेक्शन लगाए गए थे क्योंकि कुछ मामलों में तहबाजरी रिकॉर्ड और वास्तविक कब्जे के क्षेत्रफल में भारी अंतर बताया जा रहा था। आरोप है कि कुछ लोग रिकॉर्ड से कहीं अधिक भूमि को अपने नाम करवाने की कोशिश में लगे हुए थे, जिसके चलते फाइलें रोक दी गई थीं।
तबादलों के बाद बदला माहौल, फिर सक्रिय हुए बिचौलिए
नगर परिषद में पिछले कुछ महीनों के दौरान हुए अधिकारियों के तबादलों के बाद इन फाइलों में अचानक हलचल बढ़ी है। सूत्रों का दावा है कि कुछ तथाकथित दलाल और बिचौलिए फिर से सक्रिय हो गए हैं और वे इन मामलों को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए पूरी ताकत लगा रहे हैं।
चर्चा यह भी है कि कुछ लोग संबंधित अधिकारियों के साथ लगातार संपर्क में हैं और लंबित फाइलों से जुड़े हर पहलू पर काम कर रहे हैं। पिछले करीब एक महीने से एक व्यक्ति को नगर परिषद कार्यालय में नियमित रूप से देखा जा रहा है, जो घंटों तक संबंधित शाखाओं और अधिकारियों के कार्यालयों में बैठकर फाइलों का अध्ययन करता नजर आया है। इससे पूरे मामले को लेकर संदेह और गहरा गया है।
सरकारी जमीन या निजी जागीर
नगर परिषद की नई मंडी क्षेत्र में स्थित दुकानें और व्यावसायिक स्थल आज करोड़ों रुपये की संपत्ति माने जाते हैं। यदि नियमों को दरकिनार कर वास्तविक रिकॉर्ड से अधिक क्षेत्र की रजिस्ट्री कर दी गई तो नगर परिषद को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
यही कारण है कि शहर में यह चर्चा जोरों पर है कि कहीं स्वामित्व योजना की आड़ में सरकारी संपत्ति को निजी हाथों में सौंपने की पटकथा तो नहीं लिखी जा रही।
वर्षों से ऑब्जेक्शन में पड़ी फाइलों पर अचानक इतनी मेहरबानी क्यों
क्या नियम बदल गए हैं या फिर नीयत?
जिन मामलों में पहले आपत्तियां थीं, वे अब कैसे समाप्त हो रही हैं?
क्या तहबाजरी रिकॉर्ड से अधिक क्षेत्र की रजिस्ट्री की तैयारी चल रही है?
यदि नगर परिषद को करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ तो जिम्मेदार कौन होगा?
क्या जिला प्रशासन और सरकार इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करवाएंगे?
क्या सभी फाइलों को सार्वजनिक कर पारदर्शिता सुनिश्चित की जाएगी?
भविष्य के गर्भ में बड़ा फैसला
फिलहाल नगर परिषद की इन फाइलों को लेकर चर्चाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। शहर के लोगों की नजर अब इस बात पर टिकी है कि स्वामित्व योजना का लाभ वास्तव में पात्र लोगों तक सीमित रहता है या फिर नियमों की आड़ में करोड़ों रुपये की सरकारी जमीन को लेकर कोई बड़ा खेल सामने आता है।
नगर परिषद की इन फाइलों का भविष्य चाहे जो हो, लेकिन एक बात तय है कि यदि नियमों से समझौता हुआ तो यह मामला नगर परिषद का सबसे बड़ा स्कैम साबित हो सकता है।
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