नारनौल | सीएम विंडो का सच : शिकायतकर्ता को खबर तक नहीं और फाइल हो गई बंद | सरकार की छवि चमकाने के लिए बनाए नारनौल के एमिनेंट पर्सन्स पर सवाल
नारनौल। मुख्यमंत्री द्वारा आम जनता की शिकायतों के त्वरित और निष्पक्ष समाधान के लिए बनाई गई सीएम विंडो व्यवस्था अब नारनौल में सवालों के घेरे में दिखाई दे रही है। आरोप है कि सरकार की आंख और कान बनकर काम करने के लिए नियुक्त किए गए कुछ एमिनेंट पर्सन ही अधिकारियों के साथ मिलकर शिकायतों […]

नारनौल। मुख्यमंत्री द्वारा आम जनता की शिकायतों के त्वरित और निष्पक्ष समाधान के लिए बनाई गई सीएम विंडो व्यवस्था अब नारनौल में सवालों के घेरे में दिखाई दे रही है। आरोप है कि सरकार की आंख और कान बनकर काम करने के लिए नियुक्त किए गए कुछ एमिनेंट पर्सन ही अधिकारियों के साथ मिलकर शिकायतों को बिना उचित सुनवाई के दफ्तर दाखिल कर रहे हैं। यदि ये आरोप सही हैं तो यह न केवल शिकायतकर्ताओं के साथ अन्याय है, बल्कि सरकार की मंशा और उसकी जनहितकारी योजनाओं को भी नुकसान पहुंचाने वाला मामला है।

शिकायतकर्ता पवन कुमार यादव
पिछले कई महीनों से नगर परिषद, पंचायत विभाग, जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग और बिजली विभाग से संबंधित शिकायतों में ऐसे मामले सामने आने की चर्चा रही है।अब कुछ शिकायतकर्ताओं ने खुलकर सामने आकर अपनी पीड़ा व्यक्त की है।
शिकायतकर्ता पवन कुमार यादव का आरोप है कि उनकी शिकायत को संबंधित विभाग और एमिनेंट पर्सन की मिलीभगत से दफ्तर दाखिल कर दिया गया। उनका कहना है कि उन्हें न तो सुनवाई के लिए बुलाया गया और न ही यह बताया गया कि उनकी शिकायत का निस्तारण किस प्रकार किया गया। बाद में उन्हें पता चला कि उनकी शिकायत पहले ही बंद की जा चुकी है।

शिकायतकर्ता को भनक तक नहीं और उसकी शिकायत एमिनेंट पर्सन ने कर दी फाइल
अब बड़ा सवाल यह है कि शिकायतकर्ता को सुने बिना शिकायत कैसे बंद हो गई।
यदि किसी शिकायतकर्ता को यह तक जानकारी नहीं है कि उसकी शिकायत कब बंद हुई, तो फिर शिकायत के समाधान की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है,
क्या शिकायतकर्ता की सहमति ली गई,
क्या मौके पर जांच हुई,
क्या शिकायतकर्ता से फोन पर भी संपर्क किया गया?
यदि नहीं, तो शिकायत बंद करने का आधार क्या था?
सरकार की छवि सुधारने के लिए बने थे एमिनेंट पर्सन, फिर छवि खराब क्यों हो रही है।
सरकार ने एमिनेंट पर्सन्स की नियुक्ति इस उद्देश्य से की थी कि प्रशासन और जनता के बीच विश्वास कायम हो सके। लेकिन यदि वही लोग शिकायतकर्ताओं को न्याय दिलाने की बजाय शिकायतों को फाइलों में दबाने का माध्यम बन जाएं तो फिर इस व्यवस्था का औचित्य क्या रह जाता है?
जनता में यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि यदि शिकायतों का निष्पक्ष निस्तारण नहीं होना है, तो फिर सीएम विंडो पर शिकायत करने का क्या लाभ।
नगर परिषद, पंचायत, पब्लिक हेल्थ और बिजली विभाग सबसे ज्यादा चर्चा में
सूत्रों के अनुसार नारनौल में विशेष रूप से नगर परिषद, पंचायत विभाग, जन स्वास्थ्य विभाग और बिजली विभाग से जुड़ी कई शिकायतों में शिकायतकर्ताओं को यह तक नहीं बताया गया कि उनकी शिकायत कब और किस आधार पर दफ्तर दाखिल कर दी गई।
यदि ऐसा है तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि शिकायत निवारण प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न है।
सवाल यह भी हैं जो लोग जानना चाहेंगे।
क्या सीएम विंडो पर बंद की जा रही शिकायतों का स्वतंत्र ऑडिट होगा? क्या शिकायतकर्ता की संतुष्टि के बिना शिकायत बंद की जा सकती है? क्या एमिनेंट पर्सन्स की कार्यप्रणाली की समीक्षा होगी? क्या अधिकारियों और एमिनेंट पर्सन्स की मिलीभगत के आरोपों की जांच करवाई जाएगी? क्या भविष्य में शिकायत बंद करने से पहले शिकायतकर्ता की लिखित सहमति अनिवार्य बनाई जाएगी?
जनता की मांग, हो निष्पक्ष जांच
शिकायतकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि नारनौल में पिछले कुछ महीनों के दौरान सीएम विंडो पर दफ्तर दाखिल की गई शिकायतों की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि किसी शिकायत को बिना उचित प्रक्रिया के बंद किया गया है तो संबंधित अधिकारियों और जिम्मेदार व्यक्तियों की जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए।
लोगों का कहना है कि मुख्यमंत्री की महत्वाकांक्षी सीएम विंडो व्यवस्था तभी सफल मानी जाएगी जब आम नागरिक को यह भरोसा हो कि उसकी शिकायत सुनी जाएगी, दबाई नहीं जाएगी। वरना जनता के बीच यह संदेश जाएगा कि शिकायत दर्ज करवाना आसान है, लेकिन न्याय पाना नहीं।



