कोरियावास मेडिकल कॉलेज विवाद: ‘महर्षि च्यवन’ बोर्ड हटाने पर बवाल ,उद्घाटन से पहले बढ़ा तनाव ,मनीष वशिष्ठ एडवोकेट ने बताया जात-पात की राजनीति

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कोरियावास मेडिकल कॉलेज क्यों बना राजनीति का केंद्र

नारनौल के पास गांव कोरियावास में स्थापित महर्षि च्यवन राजकीय आयुर्विज्ञान महाविद्यालय एक बार फिर स्वास्थ्य सेवाओं से ज्यादा राजनीति के कारण चर्चा में है। जिस संस्थान को सरकार ने क्षेत्र की जनता को बेहतर चिकित्सा सुविधाएं देने के उद्देश्य से खड़ा किया, वही अब नामकरण, श्रेय और प्रतीकात्मक कब्जे की राजनीति का केंद्र बनता दिखाई दे रहा है।

नामकरण को लेकर पहले क्या हुआ था पूरा मामला

सार्वजनिक रिपोर्टों के अनुसार संस्थान का आधिकारिक नाम महर्षि च्यवन ऋषि के नाम पर दर्ज है, जबकि बाद में हुए राजनीतिक समझौते के तहत अस्पताल खंड का नाम राव तुलाराम के नाम पर रखने का रास्ता निकाला गया था।

मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की घोषणा और खत्म हुआ था विवाद

इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। क्षेत्र में लंबे समय तक नामकरण को लेकर विवाद चला, धरना चला और अलग-अलग पक्षों ने अपने-अपने दावे पेश किए। नवंबर 2025 में मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने सार्वजनिक मंच से कहा कि मेडिकल कॉलेज का नाम महर्षि च्यवन ऋषि ही रहेगा, जबकि अस्पताल का नाम राव तुलाराम के नाम पर होगा। उसी घोषणा के बाद धरना समाप्त होने की बात भी रिपोर्टों में सामने आई।

गेट नंबर 1 से नाम हटाने पर कैसे शुरू हुआ नया विवाद

अब नया विवाद इसलिए खड़ा हुआ है क्योंकि आरोप है कि मेडिकल कॉलेज के मुख्य द्वार, यानी गेट नंबर 1 पर पहले लिखे महर्षि च्यवन नाम को मिटाकर वहां प्रकाशयुक्त बोर्ड पर राव तुलाराम अस्पताल लिख दिया गया। यहीं से मूल प्रश्न जन्म लेता है।

मुख्य द्वार की पहचान बदलने पर उठे बड़े सवाल

यदि राव तुलाराम अस्पताल, मेडिकल कॉलेज परिसर का एक हिस्सा है, तो फिर मुख्य द्वार पर पूरे संस्थान की पहचान क्यों बदली गई। सवाल सिर्फ बोर्ड का नहीं है, सवाल प्रशासनिक समझ, राजनीतिक संदेश और ऐतिहासिक संतुलन का है। क्योंकि मुख्य द्वार पूरे महाविद्यालय की पहचान का प्रतीक माना जाता है।

पुराने विवाद और तनाव की फिर ताजा हुई यादें

इस प्रकरण ने उस पुराने विवाद की याद भी ताजा कर दी है, जब नामकरण को लेकर क्षेत्र में तनाव बढ़ा था और महर्षि च्यवन नाम वाला बोर्ड क्षतिग्रस्त किए जाने की खबरें भी सामने आई थीं। उस दौर में विरोध और समर्थन, दोनों ने इस संस्थान को चिकित्सा से ज्यादा प्रतीकात्मक वर्चस्व की लड़ाई में धकेल दिया था।

उद्घाटन से पहले फिर क्यों गरमाया माहौल

अब जबकि ओपीडी और रेडियोलॉजी विभाग जैसे जरूरी स्वास्थ्य ढांचे के विस्तार का कार्यक्रम सामने है, तब गेट पर नाम बदलने जैसी कार्रवाई ने यह संदेश दिया है कि चिकित्सा से पहले राजनीति अब भी आगे खड़ी है। 5 अप्रैल 2026 की सार्वजनिक रिपोर्ट के अनुसार सोमवार को राव तुलाराम अस्पताल के नए ओपीडी और रेडियोलॉजी विभाग के उद्घाटन का कार्यक्रम तय था।

जनता के बीच क्या है असली चिंता

यही वह बिंदु है, जहां जनता के मन में असली असहजता पैदा होती है। एक ही संस्थान में बार-बार उद्घाटन, नामकरण और शिलापट्ट की राजनीति आखिर किसके लिए है। जनता के लिए या नेताओं के लिए।

मनीष वशिष्ठ एडवोकेट का बयान

इतिहास एवं संस्कृति संरक्षण संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष और नारनौल बार एसोसिएशन के पूर्व प्रधान मनीष वशिष्ठ ने इस मुद्दे पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है।
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि स्वास्थ्य मंत्री आरती सिंह राव तुरंत गेट पर ‘महर्षि च्यवन’ का बोर्ड दोबारा लगाने के आदेश नहीं देती हैं, तो यह समझा जाएगा कि वे क्षेत्र में जात-पात की राजनीति कर रही हैं।

उन्होंने कहा, “यह केवल एक बोर्ड नहीं, हमारी इतिहास और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है।”
“अगर इसे वापस नहीं लगाया गया, तो बड़ा जनसंघर्ष किया जाएगा।”

 सरकार के फैसले और विश्वसनीयता पर उठते सवाल

दरअसल, समझना यह होगा कि किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व का सम्मान दूसरे को हटाकर नहीं किया जाता। यदि सरकार ने संतुलित रास्ता पहले ही तय किया था, तो उसे बनाए रखना जरूरी है।

मेडिकल कॉलेज का विकास और नई योजनाएं

कोरियावास का यह संस्थान क्षेत्र की बड़ी स्वास्थ्य आशा के रूप में देखा गया है। 2026 में इसके विस्तार और नई सेवाओं को लेकर कई रिपोर्ट सामने आई हैं। जनवरी 2026 में सीनियर रेजिडेंट के 68 पदों के लिए साक्षात्कार और मार्च 2026 में डायलिसिस केंद्र की जानकारी भी सामने आई थी।

अब सरकार के अगले कदम पर टिकी नजरें

अब नजरें स्वास्थ्य मंत्री के अगले कदम पर टिकी हैं। यदि गेट नंबर 1 पर महर्षि च्यवन राजकीय आयुर्विज्ञान महाविद्यालय की पहचान बहाल नहीं होती है, तो विवाद फिर बढ़ सकता है।

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