ज़िला
नारनौल। ग्रीवेंस बैठकों पर उठे सवाल : आदेशों की साख पर संकट | समाधान की जगह ‘शो’ का आरोप
नारनौल। करीब दो दशक पूर्व हरियाणा सरकार द्वारा जनहित में शुरू की गई मासिक ग्रीवेंस बैठकों की उपयोगिता पर अब गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। हर महीने प्रदेश के मंत्री जिला स्तर पर आम जनता की समस्याएं सुनने के लिए बैठक करते हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि इन बैठकों का परिणाम अधिकांश मामलों में शून्य नजर आता है।
जिलों से लगातार ऐसी तस्वीरें सामने आ रही हैं, जहां मंत्री तो बैठक की अध्यक्षता करते हैं, लेकिन अधिकारी उनकी बातों को गंभीरता से लेने के बजाय कई बार खुलकर बहस करते हुए भी देखे गए हैं। स्थिति यहां तक पहुंच जाती है कि मंत्रियों द्वारा दिए गए सख्त निर्देश, यहां तक कि सस्पेंड करने के आदेश भी कागजों तक सीमित रह जाते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इन बैठकों में दिए गए आदेशों की वास्तविक वैल्यू क्या रह गई है?
दूसरी ओर, ग्रीवेंस कमेटियों की संरचना भी विवादों में है। कमेटियों में सदस्यों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, जिससे यह मंच समाधान की बजाय शक्ति प्रदर्शन का अखाड़ा बनता दिख रहा है। खासकर जिला महेंद्रगढ़ की बैठकों का नजारा हर बार चर्चा का विषय बनता है। यहां कई बार खुद सत्ताधारी दल के पदाधिकारी और कमेटी सदस्य एक समूह बनाकर खड़े हो जाते हैं और किसी विशेष अधिकारी को निशाने पर ले लेते हैं।
बैठक के दौरान मंच के नीचे से शुरू हुआ यह दबाव, मंच के ऊपर बैठे किसी ना किसी नेताओं के हस्तक्षेप के साथ और तेज हो जाता है। नतीजा यह निकलता है कि जिस अधिकारी को टारगेट किया जाता है, उसे भरी बैठक में सार्वजनिक रूप से फटकार मिलती है और कभी-कभी निलंबन तक की नौबत आ जाती है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि आम जनता, जो महीनों तक अपनी समस्याओं के समाधान की उम्मीद में इन बैठकों तक पहुंचती है। उनको तो ठोस समाधान कम ही मिल पाता है। लेकिन जो कमेटी के सदस्य है अंदर अपने मकसद में कामयाब हो जाते हैं। वही अनेक लोग अपनी फरियाद मौके पर इसलिए लेकर पहुंच जाते है कि शायद उनकी भी सुनवाई हो जाए लेकिन ऐसे फरियादियों को बैठक स्थल में प्रवेश तक नहीं मिल पाता है। जबकि सही मायने में तो यह मंच उनके लिए ही बनाया गया और वही लोग हाशिए पर नजर आते हैं।
ऐसे हालात में यह कहना गलत नहीं होगा कि ग्रीवेंस बैठकों का मूल उद्देश्य भटक चुका है। अब जरूरत है कि हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी इस व्यवस्था की गंभीर समीक्षा करें।
या तो इन बैठकों के लिए सख्त और पारदर्शी मानक तय किए जाएं, जिससे आम जनता की समस्याओं का वास्तविक समाधान सुनिश्चित हो सके, या फिर जनता के हित में कोई नया और प्रभावी विकल्प तलाशा जाए। फिलहाल, व्यवस्था की खामियों का खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है, जबकि कुछ जिलों में यह मंच आपसी राजनीति और दबाव की भेंट चढ़ता दिखाई दे रहा है।
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