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Ateli News : रसायन छोड़ प्रकृति की राह—75 वर्षीय किसान ओमवीर सिंह बने मिसाल
स्थान: मंडी अटेली, महेंद्रगढ़ , संवाददाता: जितेन्द्र सोलंकी
मंडी अटेली क्षेत्र के गांव खोड़ निवासी 75 वर्षीय किसान ओमवीर सिंह ने प्राकृतिक खेती अपनाकर एक नई मिसाल पेश की है। जहां एक ओर किसान रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर निर्भर होते जा रहे हैं, वहीं ओमवीर सिंह पिछले चार-पांच वर्षों से जैविक और प्राकृतिक खेती कर न केवल अपनी जमीन की उर्वरता बढ़ा रहे हैं, बल्कि अन्य किसानों को भी प्रेरित कर रहे हैं।
ओमवीर सिंह ने बताया कि उन्होंने रासायनिक खेती को पूरी तरह छोड़ दिया है और प्राकृतिक तरीकों को अपनाया है। इसके लिए उन्होंने जींद में तीन दिन का प्रशिक्षण लिया, जिसके बाद अपने खेतों में मौसमी, नींबू और अमरूद के पौधे लगाकर जैविक खेती की शुरुआत की। वर्तमान में वे आलू, गोभी, टीड़ा और घीया जैसी फसलों का उत्पादन भी बिना किसी रासायनिक दवा के कर रहे हैं।
उनकी खेती की खास बात यह है कि वे खाद और कीटनाशक दवाइयां खुद तैयार करते हैं। जीवामृत बनाने के लिए वे 200 लीटर पानी में 25 किलोग्राम गुड़, 5 किलोग्राम गोमूत्र, 10 किलोग्राम गोबर और 2 किलोग्राम बेसन मिलाकर पारंपरिक तरीके से 21 दिनों तक तैयार करते हैं। इसके अलावा नीम, धतूरा और आंकड़े के पत्तों से कीटनाशक दवाइयां बनाकर साल में दो बार उपयोग करते हैं, जबकि फंगस नियंत्रण के लिए चावल और गुड़ से दवा तैयार करते हैं।
किसान का कहना है कि प्राकृतिक खेती लागत को कम करती है और मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखती है। साथ ही इससे तैयार होने वाली फसलें स्वास्थ्य के लिए भी अधिक लाभकारी होती हैं। वे अपनी खेती में किसी भी प्रकार की खरपतवार नाशक दवा का उपयोग नहीं करते, जिससे खेत की जैव विविधता सुरक्षित रहती है।
प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के उनके प्रयासों की प्रशासन द्वारा भी सराहना की जा चुकी है और उन्हें कई बार सम्मानित किया गया है। अब आसपास के किसान भी उनकी पद्धति को समझने और अपनाने के लिए उनके पास पहुंच रहे हैं।
आज के समय में जब खेती लागत और स्वास्थ्य दोनों के लिहाज से चुनौती बनती जा रही है, ऐसे में खोड़ के इस बुजुर्ग किसान ने यह साबित कर दिया है कि पारंपरिक ज्ञान और प्राकृतिक संसाधनों के सहारे खेती को टिकाऊ और लाभकारी बनाया जा सकता है।
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